मज़बूत औरत :
मज़बूत औरत :
*************
वक़्त बदल गया.... वाकई बदल गया। क्योंकि औरत अब अबला नहीं रही। अब वो इतनी सशक्त हो चुकी है कि अपनी जिंदगी के हर अच्छे बुरे निर्णय अपनी मर्ज़ी से ले सकती है। जन्म देने वाले मां बाप और परिवार भले ही कुछ भी सोचता रहे। पर उसे उसकी चाह पाने के लिए किसी भी हद तक जाना पड़े तो वो जाएगी। फ़िर उसके लिए कोई भी रास्ते कि रूकावट नहीं बन सकता।
अब औरत पहले जैसी नहीं कि जलाई जा रही हो, पीटी जा रही हो, सताई जा रही हो पर दायरों कि सीमा लाँघने कि हिम्मत नहीं जुटा पाती हो। अब औरत तय करती है कि उसे जिसको करीब रखना है कि वो कब तक साथ रहेगा और साथ रहने के लिए कब तक जिन्दा रहेगा। औरत के अंदर आया ये advancement अब बहुत सी दूसरी जिंदगीयों के लिए खतरा बन रहा.....!!
पिछले कुछ समय में घटित कई घटनाओ ने औरत की image का perception ही बदल दिया । अब औरत सोनम हो सकती है जिसने राजा रघुवंशी को मार दिया । अब औरत सिआ गोयल हो सकती है जिसने केतन अग्रवाल को मार दिया । अब औरत मुस्कान हो सकती है जिसने पति सौरभ की हत्या कर उसे नीले ड्रम में डाल दिया । अब औरत निकिता हो सकती है जिसने अपनी अनाप शनाप मांगो के चलते पति अतुल सुभाष को आत्महत्या पर मजबूर कर दिया। अब औरत श्वेता हो सकती है जो अपने लिव इन संबंद्ध पर परिवार की आपत्ति के लिए पूरे परिवार की हत्या कर सकती है । ये औरतों की ज़िद है। जो उनके अनुसार नहीं हुआ उसे उन्होंने जिंदगी से दूर करने के लिये रास्ते में आई हर अड़चन को हटा दिया।
अब इन सारी घटनाओं का मनोविज्ञानिक विश्लेषण करते हैँ कि इन हत्याओं के पीछे असल कारण क्या है..... सबसे पहले तो प्रेम में पड़ जाना इन घटनाओ का मूल कारण है और तब ज़ब वह प्रेम परिवार को स्वीकार्य नहीं हो। ये प्रेम अगर इतनी हिम्मत भर दे रहा है कि उसको पाने के चलते किसी कि हत्या कर दी जाये तो यही हिम्मत सब कुछ छोड़कर भागने या परिवार से विद्रोह करने में क्यों नहीं दिखाई जा रही। क्योंकि इस प्रेम त्रिकोण में आये नए बंदे को ये आभास बिल्कुल नहीं हो पता कि वो नितांत बाहरी है।
प्रेम करना आज कोई नया चलन नहीं आया है पर पहले शायद बस इसी हिम्मत कि कमी हुआ करती थी। आज की युवा पीढ़ी अपने चयन को सर्वश्रेष्ठ मानती है तभी कोई मेल या समानता ना होते हुए भी अपने प्रेम को पाने की जिद अमूमन उन्हें काल की गहरी खाई में धकेल देती है। पहले परिवार और समाज का लिहाज़ इस हिम्मत को थोड़ा दबाकर रखता था।
पर अब औरत मजबूत हो गई है। चाहे वो पढ़ी लिखी हो या अनपढ़ उसने अपने हक़ का जो चुना है उसे हांसिल करने के लिये वो हदें लाँघ सकती है। अपने कृत्य से परिवार को जलील होने के लिये छोड़ सकती है। अपनी जिंदगी के किसी अनचाहे की हत्या कर सकती है। पुरुष को क़ानूनी दावपेंचो में उलझाकर अपनी मनवा सकती है। एक साथ कई परिवारों को निराशा और दुःख में धकेल सकती है।
ये बदलाव अच्छा है क्योंकि समाज कुछ इसी तरह के बदलाव का इक्छित था। उसे औरत मज़बूत चाहिए थी। इतनी मज़बूत कि उसे धोखा, जलालत, हत्या आदि करने से भी गुरेज ना हो। इसके लिये समाज बधाई का पात्र है कि उसने एक मज़बूत औरत बना दिया। तो
इन घटनाओं पर दुःखी मत होइए. बल्कि जश्न मनाइये..... कि अब औरत मज़बूत है। भले उसकी पकड़ औरों का दम घोंट रही हो !
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
Comments
Post a Comment