मासूम दर्द
मासूम दर्द : 🔸•🔸•🔸•🔸•🔸 दो दिन पहले की एक घटना ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया। शाम के करीब सात से पौने आठ बजे का समय था। मैं किसी कार्यवश जिला मुख्यालय से एक गाँव की ओर जा रही थी । शहर से बाहर निकलते ही सड़क सुनसान हो गई थी। चारों तरफ अंधेरा था। दूर-दूर तक कोई दिखाई नहीं दे रहा था। तभी अचानक हमारी कार की हेडलाइट की रोशनी में एक छोटी-सी बच्ची दिखाई दी। वह नंगे पाँव तेजी से सड़क पर चली जा रही थी। सुनसान सड़क, गहरा अंधेरा और अकेली सात-आठ साल की बच्ची। हमने गाड़ी रोकी, और शीशा नीचे करके पूछा, “बेटा, कहाँ जाना है?” मेरी आवाज सुनते ही वह भागने लगी। मैंने गाड़ी से उतरकर उसे रोका। वह बुरी तरह घबराई हुई थी। चिल्लाकर कहने लगी, “मुझे जाने दीजिए, मुझे कहीं नहीं जाना है। मेरा कोई नहीं है। मेरे मम्मी-पापा सब भगवान के पास चले गए हैं।” मैंने उसे प्यार से समझाया, पानी पिलाया और हिम्मत बंधाई। लेकिन वह अपने घर का पता बताने को तैयार नहीं थी। पुलिस का नाम सुनते ही और डर गई। बार-बार कहने लगी, “नहीं, पुलिस को मत बुलाइए।” काफी देर तक बातचीत करने के बाद मैंने पूछा, “बेटा, पढ़ती हो?” उसने कहा, “हाँ।” उसने...






