आज़ाद औरत

 आज़ाद औरत :

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बेड़ियाँ है उसके पैरों में

लेकिन वो लोहे की बेड़ियाँ नहीं

फिर भी वह चल नहीं पाती


कभी परंपराओं ने रोका,

कभी मर्यादाओं ने,

कभी तमाम लोगों की निगाहें 

उसके कदमों पर हक़ जताती....


उसे बताया गया—

तुम्हारी हँसी की भी

एक सीमा होनी चाहिए,

और तुम्हारे सपनों की भी इक 

उम्र है बिरादरी उसे ये समझाती.....


उसने जब बोलना चाहा,

उसे संस्कार याद दिलाए गए,

जब अपने लिए सोचना चाहा,

तब उसे त्याग का पाठ पढ़ाती....


वह घर की इज़्ज़त बनी रही,

पर अपने अस्तित्व की

आवाज़ नहीं उठा सकी 

चारदीवारी ही में उसकी दुनिया है 

दम घोंटते इसलिए भ्रम से मन बहलाती 



उसकी सबसे मजबूत बेड़ी

कभी-कभी बाहर नहीं,

उसके भीतर बाँधी गई—

यह विश्वास दिलाकर कि 

वह अकेली कुछ नहीं कर सकती


लेकिन एक दिन

उसने आईने में स्वयं को देखा

और पहली बार ख़ुद से पूछा कि 

“मैं कौन हूँ.....?”

उस प्रश्न के साथ एक बेड़ी टूटी 

समझ आया कि अपनी वही है हिमायती 


फिर उसने जाना—

स्त्री होना

किसी सीमा का नाम नहीं,

यह तो अपनी पहचान के साथ

जीने का एक ढंग है मुलाक़ाती 


अब वह चल रही है—

किसी से लड़ने के लिए नहीं,

बल्कि....

अपने भीतर कैद उस स्त्री को

मुक्त करने के लिए अकस्माती 


और जब एक स्त्री

अपने निर्णय स्वयं लेने लगती है,

तो केवल उसकी बेड़ियाँ नहीं टूटतीं—

समाज की सोच की

एक पुरानी दीवार भी है भरभराती...!


                   ~ जया सिंह ~

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