सबक

सबक : 

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यूँ तो हम सभी अपनी अपनी दुनिया में इतने व्यस्त से हो गए कि अब अपनों के लिए ही समय कम निकल पाता है। पर क्या ये कभी सोचा है कि उन अपनों के लिए हमारी आवाज़ की एक तरंग ही काफी होती है आत्मीयता दर्शाने के लिए....इसी भाव को व्यक्त करती एक डिलीवरी बॉय की छोटी सी कहानी। जिसने डिलीवरी करते करते रिश्तों का बेहतरीन सबक सीखा......!!

◆ सबक : 

वह ज़्यादातर शाम की शिफ्ट करता था। 

उस दिन रात करीब 9 बजे उसने आख़िरी ऑर्डर उठाया। रेस्टोरेंट से पैकेट लिया तो देखा—ऑर्डर छोटा था, बस एक सादा खिचड़ी, दही  और दो केले।

पता शहर के पुराने हिस्से का था। एक जर्जर-सी बिल्डिंग। ऊपर तीसरी मंज़िल।

डोरबेल दबाई...

दरवाज़ा एक बूढ़ी अम्मा ने खोला। सफेद बाल, काँपते हाथ, आँखों पर मोटा चश्मा।

चेहरे पर थकान थी, लेकिन आवाज़ में मिठास ....

अम्मा बोली “बेटा, पैकेट अंदर रख दो…अब हाथ काँपते हैं।”

वह खाना टेबल पर रखकर जैसे ही मुड़ा कि अम्मा ने पूछा—

“दो मिनट बैठोगे क्या ? अकेले खाना अच्छा नहीं लगता।”

डिलीवरी बॉय ने घड़ी देखी। शिफ्ट तो ख़त्म हो चुकी थी। थोड़ा थका हुआ भी था। लेकिन पता नहीं क्यों, उस आग्रह को टाल नहीं सका और बैठ गया।

कमरे में सन्नाटा था। दीवार पर पुरानी घड़ी टिक-टिक कर रही थी।

एक कोने में भगवान की छोटी-सी तस्वीर और सामने दीवार पर अपनों की दर्जनों फ़ोटो....

उन्होंने थाली खोली। धीरे-धीरे खिचड़ी खाने लगीं।

हर दो कौर के बाद वो डिलीवरी बॉय की तरफ देख मुस्कुरा देती।

फिर बोली— “जानते हो बेटा, मैं रोज़ बाहर से खाना नहीं मँगाती।

आज बस मन किया… किसी इंसान की आवाज़ सुनने का।”

वह डिलीवरी बॉय चुपचाप उन्हें सुनता रहा।

उन्होंने सामने लगी तस्वीर की ओर इशारा किया।

“ये मेरे पति हैं। रेलवे में थे। पाँच साल पहले चले गए।”

फिर दूसरी तस्वीर— “ये बेटा है। कनाडा में रहता है।

बहुत अच्छा है….. हर महीने पैसे भेजता है।”

फिर थोड़ी देर चुप रहीं।

मुस्कुराईं, मगर इस बार आँखें भीग गईं—

“बस… समय नहीं भेज पाता।”

कमरे में अचानक घड़ी की टिक-टिक बहुत तेज़ सुनाई देने लगी।

उन्होंने एक कौर और खाया।

“ये बेटी है। बंगलुरु में। अपनी दुनिया में खुश है। होना भी चाहिए।

बच्चे अगर उड़ें नहीं, तो माँ-बाप ने पाला ही क्या ?”

बोलते-बोलते उनकी आवाज़ भर्रा गई। लेकिन फिर भी चेहरे पर शिकायत नहीं। बस खालीपन था।

उन्होंने उस लड़के से पूछा— “तुम्हारी माँ है?”

डिलीवरी बॉय ने कहा—“ जी हाँ।”

 अम्मा बोली “फोन करते हो रोज़?”

वह लड़का चुप हो गया।

सच ये था कि शायद वह भी कई-कई दिन घर फोन नहीं कर पाता था।

थकान, काम और भागदौड़ … हर बार यही सोचकर टाल देता था कि कल कर लूँगा।

अम्मा ने लड़के की चुप्पी पढ़ ली फिर हल्के से बोलीं—

“माँ-बाप पैसे नहीं गिनते बेटा…आवाज़ गिनते हैं।”

डिलीवरी बॉय के भीतर कुछ चुपचाप टूटने लगा। 

खाना खत्म हुआ। उन्होंने पानी पिया।

फिर पर्स से 500 रुपये निकालकर लड़के की ओर बढ़ाए।

 और बोली “ये टिप नहीं है।

ये उस आधे घंटे की कीमत है, जिसमें तुमने मुझे अकेले नहीं खाने दिया।”

लड़के ने तुरंत मना किया— “नहीं अम्मा, ये नहीं ले सकता।”

वे मुस्कुराईं— “ले लो।

तुमने खाना नहीं पहुँचाया…

आज तुमने साथ पहुँचाया है।”

बहुत आग्रह पर लड़के ने पैसे ले लिए।

लेकिन जेब में नहीं रखे। हाथ में ही पकड़े रहा।

जाते-जाते उन्होंने कहा— “और हाँ

आज घर जाकर माँ को फोन ज़रूर करना।”

उस रात अम्मा के घर से निकलकर उस लड़के ने बिल्डिंग के नीचे आकर बाइक स्टार्ट नहीं की। सबसे पहले माँ को फोन लगाया।

उधर से आवाज़ आई “आज अचानक ? सब कुछ ठीक ठाक है ना?”

बस इतना सुनते ही गला भर आया।

उस लड़के ने कहा “हाँ माँ…...बस आपकी आवाज़ सुननी थी।”

उधर कुछ सेकंड ख़ामोशी रही।

फिर माँ बोली “खाना खाया?”

और वह लड़का सड़क किनारे खड़ा होकर रोने लगा !

 बस उस रात के बाद उस लड़के ने बिना नागा रोज़ एक बार ही सही माँ को फोन करने का नियम बना लिया। 

और सिर्फ़ माँ को नहीं, उसने ये महसूस किया कि

हर डिलीवरी अब उसके लिए सिर्फ़ ऑर्डर नहीं रही

किसी घर में दवा जाती है

किसी घर में अकेलापन

किसी घर में इंतज़ार

किसी घर में बस एक आवाज़ की ज़रूरत होती है

अब वो दरवाज़ा खुलने पर जल्दी नहीं करता

चेहरा देखता , आवाज़ सुनता और कभी पूछ लेता 

“और सब ठीक ?”

ज़्यादातर लोग बस “हाँ” कह देते और कुछ लोग मुस्कुरा देते

और कुछ के चेहरे बता देते हैं कि उन्होंने पूरे दिन किसी से बात नहीं की।

दो महीने बाद उसी पते पर फिर ऑर्डर आया

वो लड़का तुरंत आर्डर लेकर गया पर दरवाज़ा किसी और ने खोला

 वो पड़ोस वाली आंटी थीं

धीरे से बोली “अम्मा तो पिछले हफ्ते चली गईं।”

कुछ सेकंड तक वो लड़का यूँ ही दरवाज़े पर खड़ा रहा। पैकेट पकड़ा चुका था तो हाथ खाली थे, लेकिन भीतर कुछ भारी गिर चुका था।

उन्होंने अंदर से एक छोटा लिफाफा लाकर दिया और कहा कि अम्मा ये “तुम्हारे लिए छोड़ गई थीं।”

हाथ काँपते हुए खोला। अंदर 500 रुपये थे और एक छोटी-सी पर्ची।

उस पर लिखा था

“बेटा, अगर ये पढ़ रहे हो, तो मैं जा चुकी हूँ। धन्यवाद उस रात मेरे साथ खाना खाने के लिए। तुमने मुझे खाना नहीं, सम्मान दिया।

और हां,  माँ कल फोन करते रहना.......अम्मा”

आज भी वो 500 रुपये वो लड़का अपने बैग की अंदर वाली जेब में रखकर घूमता है।

खर्च नहीं करता है क्योंकि उस रात पहली बार समझ आया—हर दरवाज़े के पीछे सिर्फ़ एक ग्राहक नहीं होता।

कभी एक माँ होती है।

कभी एक इंतज़ार।

कभी एक आख़िरी बातचीत।

हम सब अपनी-अपनी भूख लेकर जी रहे हैं—

किसी को रोटी चाहिए,

किसी को दवा,

और किसी को बस दो मिनट साथ।

इंसान को हमेशा पैसे की नहीं,

कभी-कभी बस मौजूदगी की डिलीवरी चाहिए.....😊

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