मन कि हलचल को रोकना
मन की हलचल को रोकना : ••••••••••••••••••••••••••
एक आदमी अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करता था। इतना प्रेम कि उसे कभी यह विचार भी नहीं आया कि प्रेम के बाहर भी कोई संसार हो सकता है। वे दोनों एक ही घर में रहते थे। एक ही मेज पर खाना खाते थे। सुबह की चाय साथ पीते थे। वर्षों से उनके बीच कोई बड़ा झगड़ा भी नहीं हुआ था। देखने वाले कहते थे कि दोनों बहुत सुखी हैं।
एक दिन पत्नी के जीवन में एक दूसरा आदमी आया।
वह कोई अजनबी नहीं था। पुराना परिचित था। वर्षों बाद मुलाकात हुई। पहले दिन पुराने दिनों की बातें हुईं। दूसरे दिन थोड़ी देर और बात हुई। फिर कभी-कभी मिलने लगे।
एक दिन उस आदमी ने उससे पूछा, “तुम खुश हो?”
महिला ने कहा, “हां।”
फिर थोड़ी देर चुप रही और बोली, “शायद।”
बस, यही ‘शायद’ की कहानी का सबसे बड़ा शब्द है।
पहली बार किसी ने उस महिला से यह नहीं पूछा था कि घर ठीक चल रहा है या नहीं? बच्चे कैसे हैं? खाना खाया या नहीं? किसी ने उससे पूछा था, “तुम खुश हो?”
कभी-कभी मनुष्य को प्रेम से पहले एक ऐसा व्यक्ति चाहिए होता है, जो उससे यह पूछे कि वह भीतर से कैसा है।
महिला को अचानक लगा कि घर में रहने वाले लोगों में से किसी ने उससे यह सवाल वर्षों से नहीं पूछा।
एक दिन महिला बीमार पड़ी। पति दवा लेकर आया।
लेकिन उसने उस दूसरे आदमी को फोन किया, बोली, “आज बहुत कमजोरी लग रही है।”
दूसरे आदमी ने कुछ नहीं कहा, सिर्फ इतना कहा, “आराम करो, अपना ख्याल रखो।”..............बस इतनी-सी बात थी।
न कोई स्पर्श हुआ था। न कोई वादा। न कोई अपराध। लेकिन उस दिन महिला ने अपने भीतर कुछ बदलता हुआ महसूस किया।
उसे लगा, बीमारी शरीर में है, लेकिन खबर देने की जरूरत मन को थी।
मन अपना पता बदल रहा था। यहीं से कहानी कठिन हो जाती है।
क्योंकि शरीर की बेवफाई दिखाई दे जाती है। मन की बेवफाई आदमी अक्सर खुद से भी छिपा लेता है।
वह कहता रहता है, “कुछ नहीं है।”
और शायद सचमुच कुछ होता भी नहीं।.......प्रेम क्या केवल शरीर के बीच होने वाली चीज है ??
रिश्ते टूटते समय कोई घंटी नहीं बजती। दीवार पर कोई दरार अचानक दिखाई नहीं देती। रिश्ते पहले मन में अपना कमरा खोते हैं। फिर उस कमरे में कोई और रहने लगता है।
एक दिन पति ने पत्नी से पूछा, “क्या तुम उससे प्रेम करती हो?”
पत्नी ने कहा, “नहीं।”
पति कुछ देर पत्नी की ओर देखता रहा। फिर बोला, “फिर मुझे डर किस बात से लग रहा है, मैं समझ नहीं पा रहा।”
पत्नी चुप रही।
पति ने कहा, “शायद इसलिए कि तुमने उसे वह सब बता दिया है, जो कभी मुझे बताया करती थी।”
पत्नी की आंखों में आंसू आ गए।
उसने कहा, “तुम मुझे सुनते नहीं थे। घर में कोई नहीं सुनता।”
पति ने धीरे से पूछा, “उसने सुना?”
“हां।”
“तो फिर तुमने उसे क्या दिया?”
महिला कुछ देर चुप रही।
फिर बोली, “विश्वास। समय। प्रतीक्षा।”..........तीन ही शब्द थे।
लेकिन रिश्तों की पूरी कहानी इन्हीं तीन शब्दों में छिप गई।
बहुत कम लोग जानते हैं कि प्रेम में सबसे अंतरंग स्पर्श हमेशा शरीर का नहीं होता। कई बार वह ‘क्षण’ ज्यादा अंतरंग होता है, जब कोई अपने मन की वह बात आपको बता देता है, जिसे उसने पूरी दुनिया से छिपाकर रखा था।
मनुष्य को मित्र चाहिए। उसे किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत होती है जिसके सामने वह अपने भीतर का बोझ रख सके।
इसमें कोई बुराई नहीं।
हर दोस्ती प्रेम नहीं होती।
हर निकटता विश्वासघात नहीं होती।
हर किसी से अपनी बात कह देना विवाह या किसी रिश्ते के खिलाफ अपराध नहीं है।
रिस्क वहां शुरू होता है जहां मित्रता को छिपाना पड़ता है। जहां फोन पर आया एक नाम मन का मौसम बदल देता है। जहां किसी की एक आवाज सुनने के लिए मन बेचैन रहने लगता है। जहां आप अपने दुख की खबर सबसे पहले किसी और को देने का दिल करने लगता है।
और सबसे खतरनाक बात यह होती है कि किसी और से झूठ बोलने से पहले आप खुद से झूठ बोलना शुरू कर देते हैं।
कभी-कभी तीसरा आदमी कोई इंसान भी नहीं होता। वह आपका अकेलापन होता है। वह आपकी उपेक्षा होती है। वह वर्षों से आपके मन में जमा हुई चुप्पी होती है। वह आपके भीतर उठता वो सवाल होता है, जिसे घर में किसी ने पूछना बंद कर दिया होता है। वह वह हाथ होता है, जिसे पकड़ने की जरूरत थी, लेकिन किसी ने अपना हाथ बढ़ाया ही नहीं।
इसलिए जब किसी रिश्ते में कोई तीसरा व्यक्ति दिखाई दे, तो केवल तीसरे व्यक्ति को दोष देना बहुत आसान है। कठिन काम है यह पूछना कि वह जगह खाली किसने छोड़ी थी?
एक दिन पत्नी ने उस दूसरे आदमी से कहा, “हमें अब बात नहीं करनी चाहिए।”
उसने पूछा, “क्यों?”
वह बोली, “क्योंकि मुझे डर लगने लगा है कि तुम मेरे जीवन का वह हिस्सा बन गए हो, जिसे मुझे अपने पति से छिपाना पड़ रहा है।”
दूसरे आदमी ने कहा, “लेकिन हमने कुछ किया ही नहीं।”
वह मुस्कराई।
उसने कहा, “शायद इसी कारण रुक जाना चाहिए। क्योंकि जब तक कुछ हुआ नहीं है, तब तक लौटना संभव है।”
वह घर वापस आई।
पति खिड़की के पास बैठा था।
उसने पूछा, “कहां गई थीं?”
पत्नी ने पहली बार बिना किसी डर के कहा, “तुमसे बात करने।”
रिश्ता हमेशा उस दिन नहीं बचता जब कोई तीसरा व्यक्ति चला जाता है। रिश्ता उस दिन बचता है जब दो लोग फिर से एक-दूसरे की ओर लौटते हैं।और यह कहानी सिर्फ पति-पत्नी पर लागू नहीं होती।
हर रिश्ते पर लागू होती है।.........मां-बेटे पर। पिता-बेटी पर। दो दोस्तों पर। भाई-बहन पर। प्रेमी-प्रेमिका पर। यहां तक कि उन रिश्तों पर भी, जिनका कोई नाम नहीं होता।
किसी रिश्ते में सबसे बड़ी दूरी तब नहीं आती जब दो लोग अलग-अलग कमरों में रहने लगते हैं।
सबसे बड़ी दूरी तब आती है, जब दो लोग पास बैठे हों और फिर भी अपनी सबसे जरूरी बात किसी तीसरे से कहने लगें।
प्रेम की परीक्षा यह नहीं है कि आपको दुनिया में किसी और में सुंदरता दिखाई देती है या नहीं। सुंदरता दिखाई देगी। समझदार लोग मिलेंगे। आपको सुनने वाले भी मिलेंगे। आपको पसंद करने वाले भी मिलेंगे।
प्रेम की असली परीक्षा यह है कि किसी और में सुंदरता दिखाई देने के बाद भी आप अपने रिश्ते के भीतर की सच्चाई से भागते हैं या नहीं।
इसलिए रिश्तों के बीच अगर संवाद मर गया है, तो उसे जीवित कीजिए।
अगर शिकायत है, तो कहिए।
अगर अकेलापन है, तो स्वीकार कीजिए।
अगर किसी तीसरे ने आपके मन में जगह बनानी शुरू कर दी है, तो सबसे पहले उस तीसरे से नहीं, खुद से बात कीजिए।
क्योंकि रिश्ते की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि कोई किसी और के करीब चला गया। सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि दो लोग एक ही घर में रहते रहे और उनके बीच से उनका मन चुपचाप निकल गया।
शरीर देर से दूर जाता है। मन पहले चला जाता है। जब मन चला जाता है, तब आदमी अक्सर आखिरी सवाल पूछता है, “हमारे बीच आखिर हुआ क्या?”
जवाब बहुत महीन होता है। कुछ हुआ नहीं था।
लेकिन… कुछ बचा भी नहीं था। अपने रिश्तों को बचाना है तो शरीर को बांधने से पहले मन को सुनिए। किसी को अपना बनाना मुश्किल नहीं है। मुश्किल यह है कि जो अपना है, उसे अपना कैसे बनाए रखें।
मन को अपना पता बदलने से रोकिए.....!
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