आखिर युद्ध चाहिए ही क्यों ? ?

 आखिर युद्ध चाहिए ही क्यों ? ?

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युद्ध कभी आमजन की पसन्द नहीं होता। ये तो बस राजनीति की चाह होती है। राजनीति करने वाले नेता और देश के सर्वोच्च पद पर बैठे अधिकारी अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिए इसको होने देना चाहते हैं। आख़िर देश की सीमाओं के विस्तार से रोजमर्रा कमाकर खाने वाले को क्या लाभ होगा। 

किसी भी आम इंसान की चाहत होती है एक सुकूँ भरी जिंदगी और रोज की रोटी पानी की समुचित व्यवस्था। उसके परिवार की सरंक्षण व सुरक्षा और जरूरतों का भरण पोषण। 

उसे देश की राजनीति से बस इतना ही मतलब होता है कि वो राजनीति जो योजनाएं बनाएं इसमें उसका हित निहित हो। शायद इसी उम्मीद में वो सरकार चुनता है। ताकि जो जिम्मेदारी वाले पदों पर बैठे वो जनता का प्रतिनिधित्व उसकी भलाई के लिए करे। 

पर जब ये राजनेता ख़ुद को जनता का मालिक समझने लगते हैं और देश को अपना हक तब इस तरह की तानाशाही नज़र आती है। जहां देशों को तबाह होने में ज्यादा वक्त नहीं लगता। सीमाएं बढ़ाने से कोई भी देश मजबूत नहीं होता बल्कि वहां रह रहे आमजन को सुरक्षित सरंक्षित और संपन्न करने से देश तरक़्क़ी करता है। 

युद्ध तो सिर्फ़ विनाश का प्रतीक है।जिसमें तबाही और बर्बादी के ही किस्से जनम लेते हैं। अमूमन ये बड़े नेता ख़ुद को सुरक्षित बना लेते हैं पर इन युद्धों की भेंट एक आम आदमी और उसका परिवार चुकाता हैं। 

इसलिए ये युद्ध बन्द होने चाहिए...यही आम जन की मांग है ।

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