होली की रंगत में स्त्री की सुसंगत

 होली की रंगत में स्त्री की सुसंगत :

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अभी अभी हमारे यहां होली का त्यौहार मनाया गया। जो फाल्गुन माह में आता है। रंग, मिठाईयां और मेल मिलाप से भरपूर ये पर्व खुशियों से भरा होता है। लेकिन किसी भी त्यौहार को ख़ुशनुमा बनाना उस घर की स्त्री से ही होता है।  स्त्री से ही त्यौहारों की रंगत और लज्ज़त है। 

होली के रंग केवल गुलाल और पानी से नहीं बनते, बल्कि उन रंगों में घर की स्त्री का स्नेह घुला होता है। वही स्त्री है जो किसी भी त्योहार को सचमुच त्योहार बनाती है। यदि घर में स्त्री की उपस्थिति न हो तो त्योहार का उत्साह भी जैसे अधूरा सा रह जाता है। होली का पर्व भी इसी सच्चाई का सुंदर उदाहरण है, क्योंकि इसकी तैयारी से लेकर उसके उल्लास तक हर रंग में एक स्त्री की मेहनत और प्रेम छिपा होता है।

होली आने से कई दिन पहले ही घर की स्त्री के मन में एक अलग हलचल शुरू हो जाती है। वह घर की सफाई करती है, पुराने कोनों को सजाती है और पूरे घर को इस तरह संवारती है जैसे कोई नई खुशी आने वाली हो। रसोई में गुझिया, मठरी, शक्करपारे , दही बड़े और तरह-तरह के पकवानों की खुशबू फैल जाती है। इन पकवानों में केवल स्वाद नहीं होता, उनमें परिवार के लिए उसका स्नेह भी मिला होता है। घर के बच्चे और बड़े सभी उत्सुक रहते हैं, क्योंकि उन्हें पता होता है कि मां या बहन के हाथों का स्वाद ही होली को सच में खास बनाता है।

होली की सुबह जब घर में चहल-पहल शुरू होती है तब भी सबसे पहले स्त्री ही जागती है। वह घर के सभी लोगों के लिए रंग और पकवान की व्यवस्था करती है। छोटे बच्चों के चेहरे पर रंग लगाते समय उसकी आंखों में जो स्नेह झलकता है, वही असली होली का रंग होता है। वह सबको जोड़ती है, रिश्तों को करीब लाती है और घर के वातावरण को आनंद से भर देती है।

इसलिए होली केवल रंगों का खेल नहीं है, बल्कि यह मन में बसे प्रेम को व्यक्त करने का अवसर भी है। इस भावना को जीवित रखने का काम भी अक्सर वही स्त्री करती है। वह रूठे हुए लोगों को मनाती है, रिश्तों की दूरियों को कम करती है और पूरे परिवार को एक साथ बैठाकर हंसी-खुशी का माहौल बना देती है। उसके कारण ही घर का हर सदस्य त्योहार की खुशी को खुलकर महसूस कर पाता है।

गांव हो या शहर, हर जगह होली के रंगों में स्त्री की छवि दिखाई देती है। कभी वह आंगन में रंगोली बनाती है, कभी बच्चों के साथ हंसते हुए रंग खेलती है और कभी बुजुर्गों के चरण छूकर आशीर्वाद लेती है। उसकी उपस्थिति घर के हर कोने में जीवन भर देती है। वह केवल एक सदस्य नहीं होती, बल्कि पूरे परिवार की आत्मा बन जाती है जो हर पर्व को अर्थ देती है।

यदि ध्यान से देखा जाए तो होली के रंगों की असली चमक उसी स्त्री के कारण होती है जो पूरे परिवार के लिए अपना समय, अपनी मेहनत और अपना प्रेम समर्पित कर देती है। उसके बिना होली केवल एक दिन बनकर रह जाती है, लेकिन उसके साथ वही दिन यादों और भावनाओं का उत्सव बन जाता है।

अतः यह कहना गलत नहीं होगा कि होली के असली रंग गुलाल में नहीं बल्कि उस स्त्री के मन में होते हैं जो पूरे घर को अपने स्नेह से रंग देती है। वही त्योहार को केवल परंपरा नहीं रहने देती, बल्कि उसे जीवन का उत्सव बना देती है। जहां स्त्री का स्नेह होता है, वहां हर दिन में त्योहार की खुशी और हर त्योहार में जीवन की मिठास दिखाई देती है।

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