कपड़े और नज़रिया

कपड़े और नज़रिया :

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क्या कपड़े आधुनिकता का पैमाना हैं ? इसके जवाब अलग-अलग हो सकते हैं। साफ कहा जाए तो “आधुनिकता” लफ्ज़ भी कम कन्फ्यूजिंग नहीं है। ये समझ नहीं आता कि किसे आधुनिक कहा जाए, किसे नहीं । आम तौर पर पिछली एक-दो सदियों में मंज़रेआम पर आई चीजों को आधुनिक कह दिया जाता है, लेकिन अब तो आधुनिकता के भी कई हिस्से और परिभाषाएँ बना दी गई हैं। उन डिटेल्स में जाएंगे तो और उलझ जाएंगे। 

लेकिन धोती-कुर्ता, कुर्ता-पजामा, पजामा-शेरवानी, मुस्लिम औरत का हिजाब, हिन्दू औरत का घूंघट — इन्हें पुरातन माना जाता है। वहीं जीन्स-टॉप या दूसरे छोटे कपड़े, पुरुषों की फटी या चकती लगी पैंट — इन्हें आधुनिक कहा जाता है।

कपड़ों की बुनियाद पर जब सोचा जाएं तो इन्हें दो sections में रखना पड़ता है।

पहला समूह उन कपड़ों का है जो जिस्म के उन हिस्सों की नुमाइश करते हैं जो विपरीत लिंगी में सेक्सुअल ख्वाहिश या, अंग्रेज़ी में कहें तो, टेम्पटेशन पैदा करते हैं।

दूसरा समूह उन कपड़ों का है जो इन्हीं हिस्सों को एक हद तक ढक देते हैं — यानी लालच, पाने की ख्वाहिश या टेम्पटेशन के हालात ही पैदा नहीं होने देते।

अब यहाँ दूसरे समूह के कपड़ों पर एक आरोप लगाया जाता है कि ये स्त्री की यौनिकता को नियंत्रित करने का तरीका है। अगर ये स्त्री की यौनिकता का नियंत्रण है तो फिर इन्हें पुरुष की यौनिकता का भी नियंत्रक होना चाहिए...!

आधुनिक कपड़े, जो जिस्म के किन्ही खास हिस्सों की नुमाइश करते हैं,   उन्हें आखिर आधुनिकता के पैमाने क्यों माना गया है — ये बात समझ से परे है। ये कपड़े किसी स्त्री या पुरुष के व्यक्तित्व में ऐसा कौन-सा विशेष गुण जोड़ देते हैं कि इन्हें आधुनिक कहा जाए....?

पहनावे का चयन अपने कॉम्फर्ट के मुताबिक ही होना चाहिए। हाँ कुछ हद तक इसमें पर्यावर्णीय कारण भी लागू होते हैं । पर फिर भी अपनी रुचि और वातावरणीय बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए कपड़े पहने जाने चाहिए। 

पहनावे पर धर्म और संस्कृति का असर नकारा नहीं जा सकता। साथ ही सामाजिक दबाव भी कपडों के चयन हो प्रभावित करता है। अक्सर सामाजिक सम्मेलनों में वही कपड़े  पहने जाते हैं जिनकी स्वीकार्यता समाज और संस्कृति देता है।

अभी अमेरिका और ईरान के बीच टकराव के माहौल में “आधुनिकता बनाम कट्टरता” की बहस फिर से ज़ेरे-गौर है। ऐसे में मानवाधिकार, जेंडर समानता, रोज़गार और एथिक्स जैसे पैमानों पर दोनों देशों को समझने की कोशिश की जाए तो ईरान इतना बैकवर्ड कहीं से नहीं दिखता कि उसके मुकाबले अमेरिकन जॉम्बीज़ की हिमायत करनी पड़े।

ईरान को रूढ़िवादी कहा गया। जबकि सही मायनों में उसने पाश्चात्य संस्कृति को दरकिनार करते हुए बस अपने देश की संस्कृति बचाने की कोशिश की है । क्योंकि अगर संस्कृति जिंदा है तभी देश की पहचान जिंदा है। 

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