ताकत और गुरुर का जानलेवा खेल
ताकत और ग़ुरूर का जानलेवा खेल :
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165 बच्चियां काल के गाल में समा गई। फ़र्क़ पड़ा पर बस उन मां पिता को जिनके घर उनकी शरारतों से रोशन थे। बड़े लोग जिन्होंने इस मौके को ईजाद किया उनको इस दर्द का इल्म ही नहीं क्योंकि ये दर्द उनके घर तक नहीं आया। होता भी यही है कि जब तक खुद पर ना बीते हम किसी दूसरे की पीड़ा नहीं समझते। आख़िर उन मासूम बच्चियों के क्या कसूर था.....
ईरान के मिनाब शहर के एक में प्राइमरी स्कूल पर बम हमला किया गया।जो कि असंवैधानिक और असंवेदनशील कृत्य था। आखिर वो छोटी बच्चियां इस युद्ध को कितना समझती थी कि अपना बचाव कर पाती। दो मुल्कों में जो भी विवाद है। उनके हुक्मरानों के बीच जो भी मतभेद हो अगर वो आम जनता को प्रभावित नहीं कर रहे तब तक इसे सामाजिक मुद्दा नहीं मानना चाहिए। पर यदि उस विवाद में आम जनता को परेशानी और तकलीफों से दो चार होना पड़ रहा तो इसे गलत माना जाना चाहिए। ताकत और शक्ति पाने का ये अर्थ कत्तई नहीं होता कि उससे निरीह लोग तकलीफ़ में आये।
स्कूल गई हुई वो बच्चियाँ इस उम्मीद से सुबह उठी होंगी की आज स्कूल में दोस्तों से मुलाकात होगी। पढ़ाई के साथ थोड़ी मौज मस्ती भी होगी। खाने का डिब्बा एक दूसरे के साथ शेयर होगा। और फ़िर छुट्टी के समय उछलते कूदते घर वापसी होगी।
पर ये नहीं हुआ। क्योंकि हुक्मरानों को अपनी ताकत दिखाने के लिए एक वारदात की जरूरत थी। इस तरह की वारदात जिसमें आमजन प्रभावित होए। उनकी भावनाएं आहत हो। और उनके आँसू उनकी सरकार को कमज़ोर करें।
तकलीफदेह है इस तरह की घटनाएं और इस तरह की सोच। पर क्या ही किया जा सकता है। इस संमय पूरी दुनिया में शायद दमनकारी हुक्मरानों ने सत्ता पर पकड़ बनाकर रखी हुई है। क्योंकि उनका मानना है कि लोगों को दबाकर , कुचलकर ही अपना अस्तित्व कायम रखा जा सकता है। उनकी सोच और समझ में प्यार जैसी कोई भावना है ही नहीं।
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