शर्म है ऐसे पुरुषत्व पर

 शर्म है ऐसे पुरुषत्व पर: 

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 क्या इस तरह की कोई खबर पढ़कर आत्मा छलनी नहीं होती... इंसानियत तो अब लोगों में कम ही नज़र आती है। पर इतना वहशीपन कि उम्र का लिहाज़ भी उस सुख से छोटा है जिसकी तीव्र लालसा की गई है।

90 साल की बुजुर्ग महिला, जिसके ना तन में दम होगा ना ही मन में। 4 लोगों के जरिये गैंगरेप। क्या ही स्थिति हुई होगी उसकी कि 12 घण्टे तक दर्द से तड़पती रही वो। पर दरिंदों को दया नहीं आई।  

अमूमन रेप जैसी घटनाओं में विकृत मानसिकता का होना ही पाया जाता है। जिसमें इंसान अपनी वहशी लालच का वशीभूत हो जाता है। लेकिन फ़िर भी कहीं ना कहीं दिमाग तो इंसान के अंदर रहता है ना। तो क्या वो स्थिति, उम्र , स्थान आदि का भान खो बैठता है। जो भी बलात्कार जैसी घटना को अंजाम दे रहा वो इतना तो चैतन्य होता है कि उसे क्या करना है ये पता है। फिर बलात्कारी के मन में जुनून इस कदर कैसे हावी हो जाता है कि वह ये भी ना समझ सके कि जिस महिला या बच्ची के साथ वो बलात्कार कर रहा उसकी उम्र उसे वो सुख नहीं दे पाएगी जिसकी लालसा उसने की है ।

पुरुषत्व सृष्टि की देन तब तक है जब तक उसके सामने स्त्री के स्त्रीत्व का सम्मान कायम रहे। लेकिन जब पुरूष अपने अस्तित्व का उपयोग स्त्री को कुचलने के लिए करने लगे तो उसके होने पर दाग लगने लगता है। 

90 साल की बुजुर्ग महिला का शरीर पूरी तरह क्षीण और ढल चुका होता है। इस उम्र में तो अतिरिक्त जोश और वेदना भी नुकसानदेह होती है। ऐसे में चार लोगों के द्वारा जबरन बलात्कार से उसको कितनी तकलीफ़ हुई होगी ये अंदाजा लगाया जा सकता है। और सबसे बड़ी बात ये की इस बलात्कार के बाद वो अपनी शारीरिक स्थितियों का मुकाबला कैसे करेगी..? ? इस उम्र में नई कोशिकाएं बनना तकरीबन कम हो जाती है तो जो क्षरण उसके बदन का हुआ  वो कैसे ठीक होगा ? ? कुकृत्य करने वाले तो चंद घँटों में अपनी क्षुधा शांत करके चले गए पर उस वृद्धा को लंबे समय तक अपने शरीर की पीड़ा से जूझना होगा। 

बस यहीं पर आकर ऐसे घृणित समाज से मन हटने लगता है जहां ऐसे लोगों के विरुद्ध कार्यवाही में पच्चीसों कानूनी अड़चनें सामने रहती हैं। सबूत,माहौल, कारण जैसे सवाल आसानी से पुरुषों को उनके कृत्य के लिए justify करने लगते हैं।

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