डिडरोट प्रभाव / Diderot Effect

 डिडरोट प्रभाव / Diderot Effect  :

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एक चूहा जो कई दिनों से बेहद भूखा था। कमज़ोर होकर पतला हो गया था। वो एक बड़े अनाज के गोदाम में पतली सी दरार पाकर उससे घुस जाता है। वहाँ उसे बस अनाज ही अनाज दिखता है। ना किसी अन्य जानवर का डर था। वो बहुत खुश हो जाता है। और मन भर के अनाज खाना शुरू कर देता है। उसके पास और कोई काम नहीं था। बस खाना और सोना। धीरे धीरे इसी तरह बैठे हुए खाते खाते वो मोटा होने लगा। उसका शरीर भरने लगा। कुछ महीनों बाद उसे अपनों की याद आयी तो ये सोच कर उसी दरार से निकलने की कोशिश की। पर अब वो बहुत मोटा हो चुका था। उस पतली दरार से वो निकल ही नहीं पाया। फिर उसने सोचा कि चलो एक बार फिर से थोड़ी भूख का सामना करके पतले हुआ जाए। तब वह इस दरार से निकल पायेगा। पर जब अनाज का भंडार सामने पड़ा हो तो कोई कब तक भूख दबा पायेगा। इधर उधर घूमते फिरते वो अनाज खा ही लेता था। इस तरह उसके पतले होने की सारी गुंजाइश खत्म हो गई। और उसने ये मान लिया कि अब उसे इसी जगह अकेले ही मर जाना है। 

अब इसे विस्तार से व्यवहारिक पहलू से समझते हैं। ये हैं       Diderot effect .....जिसमें इंसान को जब कुछ मिलना शुरू हो जाता है तो उसे उसकी हवस होने लगती है। और फिर उपभोग का एक दुष्चक्र शुरू हो जाता है। 1986 में एक व्यग्यनिक ने फ्रांसीसी दार्शनिक डेनिस डिडरोट द्वारा प्रतिपादित अवधारणा को उन्हीं के नाम से साझा किया। 

इस प्रभाव को इस तरह समझते हैं कि जब हम कोई नई वस्तु पाते या खरीदते हैं। तो पुरानी वस्तएं अनुपयोगी होने लगती है। और ये खरीदारी का क्रम निरंतर इसी तरह चलता रहता है। नई वस्तु का craze पुरानी चीजों को बेमानी कर देता है। और हम जब फिर कोई नई वस्तु देखते है तो उसे खरीदने के लिए लालायित होने लगते हैं।

डिडरोट ने इसकी इस तरह व्याख्या की कि वह अपनी पुरानी चीजों के स्वामी होने से अब नई चीजों के सेवक बन गए। जैसे कि वह चूहा....बाहर उसे कम मिल रहा था पर वह आज़ाद था। खुले में रहता था,  पर लालच में वह गोदाम में घुस तो गया पर भूख और लालच ने उसे बंधक बना लिया। 

इसको रोकने के लिए सबसे बेहतर उपाय है कि जरूरत और इच्छाओं में अंतर समझना सीखना होगा। जिस दिन हम इस को समझ जाएंगे अनावश्यक चीजों से मोह छूटने लगेगा। और जीवन में न्यूनतमवाद की प्रवृत्ति आने लगेगी। बाजार को खुद पर हावी होने देना अपनी पारिवारिक सामाजिक और आर्थिक सभी स्थितियों के लिए घातक है । जब आदतें बड़ी होने लगती है तब उन्हें वापस संकुचित कर देना मुश्किल होने लगता है। सामाजिक तुलना से बचने के लिए सबसे पहले अपनी इच्छाओं को काबू करने होगा। 

अपनी आज़ादी, सुकून और मानसिक संतुलन को सर्वोपरि रखते हुए फिर अपनी इच्छाओं को जगह देनी चाहिए। क्योंकि इच्छाएं secondary need हैं जबकि आज़ादी सुकून और शांति प्राथमिक आवश्यकता। ताकत सब कुछ पाने में नहीं बल्कि इच्छाओं पर नियंत्रण करके छोड़ देने में होती है। 

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