प्रेम, अहसास भरी एक जिम्मेदारी

प्रेम, अहसास भरी एक जिम्मेदारी :

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कभी-कभी हम किसी इंसान को इसलिए नहीं खोते कि प्यार कम हो गया था... हम उसे इसलिए खो देते हैं क्योंकि प्यार करते-करते हम उससे बहुत कुछ माँगने लगते हैं। उसका समय, उसका ध्यान, उसकी हर बात का जवाब, हर खामोशी का मतलब। और धीरे-धीरे वह इंसान हमें प्यार से ज्यादा एक जिम्मेदारी समझने लगता है। शायद हमें किसी को पाने से ज्यादा, उसे समझना सीखना चाहिए। यह समझना कि हर बार उसका मुस्कुराना खुश होने की निशानी नहीं है और हर बार उसका चुप रहना नाराज़गी नहीं। कुछ लोग टूटते हुए भी कहते हैं, “मैं ठीक हूँ।” सिर्फ इसलिए क्योंकि वे किसी अपने को अपनी परेशानी देकर परेशान नहीं करना चाहते।

कितना अजीब है ना... हम जिससे सबसे ज्यादा प्रेम करते हैं, उसी के सामने अपने डर को सबसे ज्यादा दिखाते हैं। उसके देर से जवाब देने में दूरी ढूँढ़ लेते हैं, उसके बदले हुए लहजे में किसी और का आ जाना, और उसकी थोड़ी-सी खामोशी में अपने लिए हजार सवाल। जबकि कभी-कभी सामने वाला बस थका होता है। कभी वह खुद से लड़ रहा होता है। कभी उसके भीतर इतनी आवाज़ें होती हैं कि वह तुम्हें जवाब देने की हालत में ही नहीं होता। और ऐसे समय में शायद प्रेम यह नहीं पूछता, “तुम बदल क्यों गए?” प्रेम बस धीरे से कहता है... “जब ठीक लगे, लौट आना। मैं यहीं हूँ।”

किसी के जीवन में ऐसा इंसान होना बहुत बड़ी बात है जिसके सामने रोने के लिए कोई वजह बतानी न पड़े। जिसके सामने मजबूत बने रहने का अभिनय न करना पड़े। जिसके सामने चुप रहना भी बातचीत जैसा लगे। क्योंकि हर रिश्ता बड़ी-बड़ी कसमें खाने से नहीं बचता। कई रिश्ते तो सिर्फ एक छोटे-से वाक्य से बच जाते हैं... “चलो, पहले तुम्हें सुनते हैं।” हम अक्सर माफ़ी माँग लेते हैं, लेकिन अपने भीतर की कठोरता नहीं छोड़ते। कहते हैं, “ठीक है, जाने दो”, लेकिन मन में वही बात जमा रहती है। फिर अगली छोटी-सी गलती पर पुराने सारे हिसाब बाहर आ जाते हैं। प्रेम हिसाब की किताब नहीं है। अगर हर बात याद रखनी पड़े कि किसने कब कितना दिया और किसने कितना कम किया... तो फिर साथ रहना भी धीरे-धीरे थकान बन जाता है।

कुछ बातें छोड़नी पड़ती हैं। कुछ गलतियाँ माफ करनी पड़ती हैं। और कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें समझने में समय देना पड़ता है। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि प्रेम में खुद को खो दिया जाए। किसी के लिए इतना मत झुको कि एक दिन उठकर देखो और महसूस हो कि तुम अपने ही जीवन में कहीं पीछे छूट गए हो। प्रेम में साथ चलना खूबसूरत है... लेकिन अपनी पहचान बचाकर साथ चलना उससे भी खूबसूरत है। किसी का हाथ पकड़ो तो इस तरह नहीं कि वह छूट न सके... बल्कि इस तरह कि उसे भरोसा रहे, अगर कभी हाथ काँप जाए तो तुम उसे थाम लोगे।

और अगर कभी वह हाथ छोड़ दे... तो उसे कोसने से पहले यह याद रखना कि प्रेम किसी को रोक लेने का नाम नहीं था। कुछ लोग हमारी जिंदगी में हमेशा रहने के लिए नहीं आते। वे कुछ मौसमों की तरह आते हैं। हमें बदलते हैं। हमें कुछ सिखाते हैं। हमारे भीतर ऐसी जगह बना जाते हैं जहाँ फिर कोई आसानी से नहीं पहुँच पाता। और फिर एक दिन चले जाते हैं। उनका जाना हमेशा यह साबित नहीं करता कि प्रेम झूठा था। कभी-कभी इसका मतलब सिर्फ इतना होता है कि कहानी वहीं तक थी।

फिर भी... अगर कोई आज तुम्हारे पास है, तो उसे कल के डर में मत खो देना। उससे बातें करो। उसके साथ बैठो। कभी बिना वजह उसका हाथ पकड़ लो। कभी उसे देखकर मुस्कुरा दो। और कभी अचानक कह देना... “तुम्हारे होने की आदत नहीं डालना चाहता... तुम्हारे होने की कद्र करना चाहता हूँ।” क्योंकि आखिर में हमें बड़े-बड़े वादे याद नहीं रहते। याद रहता है वह इंसान जिसने हमारे सबसे खराब दिन में भी हमें अकेला महसूस नहीं होने दिया। याद रहती है वह आवाज़ जिसने कहा था, “घबराओ मत, मैं हूँ।” और शायद प्रेम की सबसे खूबसूरत परिभाषा भी यही है... किसी के जीवन में इतना सुकून बन जाना कि वह दुनिया से लड़कर लौटे तो उसे तुम्हारे पास आकर लड़ना न पड़े। बस सिर रख सके... और कुछ देर के लिए सब भूल सके।


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