रंगों का प्रभाव
रंगों का प्रभाव : ~~~~~~~~~~~~~~~
क्या कभी किसी ने ये एक छोटा सा प्रयोग करके देखा कि कुछ समय के लिए जिंदगी से रंग हटा दिए हों.... ये प्रयोग मन मस्तिष्क और मानसिकता सभी को प्रभावित करेगा।
सोचिये पहले के समय में लोग रंग बिरंगे कपड़े पहनते थे, रंगीन गाड़ियां खरीदते थे, घरों को थोड़ा vibrant paint करवाते थे। तो उस समय लोग खूब ख़ुश भी रहते थे।
आजकल black and white का चलन बढ़ गया। लोग dull shades pastle shades और grey कि ओर ज़्यादा जाने लगे हैँ। चाहे वो कपड़े कि choice हो घर के interior की या सवारी के रंग की। आजकल लोग बहुत reserve रहने लगे क्योंकि ये रंग सिमितता को बढ़ाते हैँ. जबकि शोख रंग खुलापन देते हैँ।
रंगों का mood ओर भी प्रभाव पड़ता है। एक रिसर्च में जेल की दीवारों को भी चटक रंगों में रंगवाया गया... जिसका प्रभाव कैदीयों की मानसिकता पर दिखा। एक हॉस्पिटल में कैंसर रोगियों पर भी एक प्रयोग हुआ। जिसमें कुछ कैंसर रोगियों को लाल कमरे में सब लाल चीज़ों के साथ रखा गया। जबकि अन्य को हल्का नीला, हल्का गुलाबी और हल्का पीला रंग दिया गया। कुछ समय पश्चात् दिखा की लाल रंग वाले रोगियों के कैंसर सेल्स बढ़ रहे थे जबकि दूसरों के घटने लगे। रगों का प्रभाव आँखों के जरिये शरीर और भावनाओं तक पहुँचता हैँ।
पुराने जमाने में लोग शोख रंग ज़्यादा चुनते थे। दक्षिण भारत में आज भी घर चटक रंगों में रंगे जाते हैँ। उसके पीछे दो कारण हैँ। एक वो इसे अपने देवताओं के रंगों से जोड़ते हैँ। जो की संस्कृति के अनुसार प्रस्तावित है। दूसरा ये उनकी जीवनचर्या की रंगिनिया को दर्शाता है। हरियाली से जुड़े रहने का, त्योहारों को मनाने का, स्वस्थ जीवनशैली का....
रंगों के चयन का बदलाव ही आजकल लोगों के व्यवहार को नीरस बना रहा है। क्योंकि आँखें grey देख देखकर तटस्थ हो गई हैँ। अब भावनायें उमड़ती नहीं। बल्कि दबाई जाती हैँ। इंसान introvert होता जा रहा।
तो कहने का तात्पर्य ये है कि अपने जीवन में रंगों को शामिल किया जाए। जिससे जीवन कि नीरसता घटेगी। और चुहलबाजी बढ़ेगी। ज़रूरी तो नहीं कि जितनी उम्र हो उसके अनुसार बड्डपन के साथ जियें। बचपना जिंदा रखना हो तो शोख रंग अपने साथ रखो।
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