बढ़ती इच्छाएं, घटती जिंदगी

 बढ़ती इच्छाएं, घटती जिन्दगी :

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कहने को तो ये मात्र एक घटना है पर इसने तीन जिन्दगीयों को खत्म कर दिया। वो भी बस एक ऐसी इच्छापूर्ति के लिए जो सामर्थ्य से बाहर थी। 

महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजी नगर के एक 18 वर्षीय युवक ने अपने माँ पिता से एक I phone की मांग रखी। पिता ड्राइवर की नौकरी करते थे। परिवार बहुत सुविधा सम्पन्न नहीं था। ये खर्च उनकी क्षमता से बाहर था। पिता ने असमर्थता जताई की अभी वह इस स्थिति में नहीं है कि उसे लाख रूपये से ऊपर का आई फ़ोन दिला सके। तो थोड़ा इंतज़ार करें। कुछ दिन में बंदोबस्त करके वह ज़रूर प्रयास करेंगे। पर लड़के को तो वह phone तुरंत चाहिए था। ज़िद और गुस्से में में वह एक ऊँची पहाड़ी पर चला गया। पीछे पीछे उसे समझाने माँ और पिता भी गए। उनसे बहस करते हुए वह पहाड़ी के बिल्कुल छोर पर खड़ा हो गया। पिता उससे बात करने समझाने उसकी ओर बढ़े । वह और पीछे की ओर सरका, और संतुलन बिगड़ने से नीचे गिरने लगा। उसे गिरता देख पिता उसे बचाने लपके... तो वो भी गिर गए। ये देख माँ भी पहाड़ी से कूद गई। एक ही क्षण में पूरा परिवार खत्म..... 😭

अब इस घटना का विस्तार समझते हैँ..... सबसे पहले उस लड़के की मनोस्थति। आख़िर एक I phone इतना जरूरी क्यों हो गया, क्योंकि उसके माँ पिता ने उसे एक normal phone दिलाया हुआ था। लेकिन क्या I phone होना, उसके लिए status simbol हो गया था। क्या उसने अपने दोस्तों या अन्य बाहरी किसी के बहकावे में आकर ये ज़िद पकड़ी..! इस ज़िद का कारण कोई भी हो पर क्या उसे अपनी ये ज़िद माँ बाप का पसीना, उनकी मेहनत उनका प्यार के आगे ज़्यादा जरूरी लग रही थी। चंद दिनों का ये महंगा शौक परिवार की जिन्दगी खा गया।  सब के सब एक साथ मर गए..... क्या जिंदा रहना उस phone के होने से ज़्यादा जरूरी नहीं था....!!

समाज आज बहुत ही विकृत मनोस्थति के स्तर पर पहुँच चूका है। सिर्फ़ materialistic चीज़ों को अहमियत दी जा रही। प्यार अपनापन  लगाव आदर लिहाज़ सब गैरमामूली हो गया है। अब लगना लगा है की इनके सहारे जिन्दगी नहीं कटती। वह हर चीज़ हाथ में होनी चाहिए जो दूसरों के हाथ में है। जिससे हम उनसे कमतर ना नज़र आएं। 

सच बताऊँ तो उस लड़के के अंत का बिल्कुल अफ़सोस नहीं हो रहा... ऐसे जिद्दी बच्चे के साथ ये होना सही था। बस दुःख उस माता पिता के लिए है जिन्होंने अपनी जिन्दगी खपा दी। उसे पालने में बड़ा करने में और उसकी इच्छाएं को ख़ुद की जरूरतों से ऊपर रखने में। उन्हें नहीं जाना चाहिए था। क्या जो लोग bccha नहीं कर पाते वह सुखी नहीं होते...?? उन्हें बस एक ही दुःख होता है औलाद न होने का। पर जिनकी औलादें हैँ वो तो पूर्ति में ही तिल तिल मर रहे हैँ। उसके बाद भी वो अच्छे माँ बाप नहीं बन सकते हैँ।

एक कहावत है कि... First you deserve then you desire. मतलब पहले काबिल बनो फ़िर इच्छाएं रखो। माँ बाप के ऊपर अपनी इच्छाओं का प्रेशर डालना क्या उचित है.... बहुत ही दुःखद घटना है। लेकिन इस तरह कि घटनाएं अभी बहुत देखने सुनने को मिलेंगी। क्योंकि हम विकास की ओर बढ़ रहे हैँ ना....!! 


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