ज़ेनजी की भड़ास

 जेनज़ी कि भड़ास....!!

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ज़ब वी मेट फ़िल्म का वो सीन याद करें ज़ब शाहिद कपूर करीना को दिल की भड़ास निकालने के लिए गाली देने को कहता है। पहले तो करीना सकुचाती है कि अच्छे घर की होकर गाली कैसे दे पर खुद को छले जाने कि तकलीफ में कॉल करके सामने वाले बंदे को गलियां देती है। फ़िर ये कहती है कि उसे बोलकर काफ़ी हल्का महसूस हो रहा। इससे ये ज़हिर होता है कि गलियां हमेशा गुस्से का नहीं बल्कि पीड़ा का भी प्रतीक होती हैँ। 

    लोकतंत्र में हमेशा तर्क महत्वपूर्ण है गाली नहीं। लेकिन ये भी सच स्वीकार करना होगा कि गाली हवा में पैदा नहीं होती। और ना ही कोई बच्चा पेट से सीख कर आता है। अमूमन गाली के पीछे कोई अपमान धोखा या अंदरूनी पीड़ा होती है। मानवीय भाषा का इतिहास बहुत पुराना है । अगर सम्मानजनक शब्द चलन में लाये गए तो प्रतिरोध के लिए भी शब्द ईजाद हुए। 

ये सत्य स्वीकारा जा सकता है कि गाली सभ्यता की भाषा नहीं है। पर ज़ब सभ्यता से कही,  समझाई हर बात विफल हो जाती है तब वही से असभ्यता जन्म लेती है और अगर ये असभ्यता गुंडागर्दी मारपीट या हत्या जैसे वीभत्स परिणाम तक नहीं पहुँचती तो निःसंदेह गाली के रूप में  बाहर निकलती है। 

    ये जो आज जेनज़ी को ये कह कर बुरा बनाया जा रहा कि ये गलियां देते हैँ  तो ये बताया जाए कि क्या सभी ने गालियाँ उसी protest वाले दिन सीखी होंगी.... ये उनके मन में पहले से  रहीं होंगी। पर उन्होंने दी तब ज़ब पीड़ा असह्य हो गई। ये जो जेनज़ी पीढ़ी है उम्र के हिसाब से उनकी समझ तो इस सरकार के सत्ता में आने के बाद ही विकसित हुई है। तो ये क्यों ना मानें कि आरोप प्रत्यारोप कि घृणित राजनीति से ही उन्होंने ये सब सीखा । क्योंकि कोई माँ बाप तो अपने बच्चोँ को गाली देने और सीखने के लिए प्रोत्साहित नहीं करेंगे। 

    ये बात समझने कि है कि अमूमन बच्चे वो नहीं बनते जो हम उन्हें पढ़ाते हैँ। बच्चे वो सीखते हैँ जो हमसे देखते सुनते हैँ। किताबें बच्चोँ को बहुत अच्छा ज्ञान देती है पर उनकी जीवनशैली विकसित होती है समाजिक व्यवहार और परिदृश्य से। जो बच्चोँ ने आगे से पाया उसमें इंटरनेट और अपनी बुद्धि लगाकर उसे मीम बना दिया। लेकिन फ़िर ये सोचना होगा कि उन्हें ये सब करने के लिए उकसाया गया। 

  ज़ब संसद में खड़े होकर चयनित नेता अपशब्द और गालियाँ देने लगते हैँ तो  फ़िर वही भाषा असंसदीय कैसे हो गई.... जिनके ऊपर समाज देश और जनता को बेहतर बनाने कि जिम्मेदारी है वो ही सिखाने में असफल हों तो जेनज़ी को दोष देना गलत है। न्यूटन के सिद्धांत के अनुसार हर क्रिया कि एक तीव्र और निश्चित प्रतिक्रिया होती है। पिछले 12 साल में अपनी समझ विकसित होती देखते हुए उन्होंने यही सब सीखा। तो बदले में वापस किया। अब जो लोग उनके संस्कारी होने का रोना रो रहे एक बार वह सभी अपने प्यारे बच्चोँ जिनको उन्होंने बहुत संस्कार देकर पाला होगा उनकी भी कभी कभार प्रतिक्रिया मे कही भाषा याद कर लें। तो ये समझ आ जायेगा कि जंतर मंतर पर बैठी पीढ़ी भी हमारे वही बच्चे है....। 


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