बचपन
बचपन :
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मुस्कुराहटें, कहकहे और मस्तियाँ
जाने कहाँ खो गए....
ज़ब खुद को आईने में देखा तो पाया
कि हम बड़े हो गए....
बचपन का वो हिस्सा फ़िर से जीना है
तो चलो कुछ जतन करें...
बेपरवाही बेतकल्लुफ़ी अपना पाएंगे
फ़िर से उन दिनों में जो गए....
खुशनुमा दरारों से झांकता बचपन
फ़िर से हममें समायेगा....
मासूमियत भरी स्वच्छन्दता के फ़िर से
जो हम मुरीद हो गए...
क्या खूब जियेंगे वक़्त मनमानियों का
कोई बंधन और बंदिश नहीं....
मर्ज़ीयों पर सूरज उगेगा और चाँद की
हिदायत बिना बेफिक्र सो गए...
बड़े होकर बहुत कुछ गँवाया है हमने
किस किस का गिला करें....
इन्हीं शिकवे से परेशाँ होके पलकों को
कई बार आँसूओं से भिगो गए....
अब आँखें ख़ुशी से चमकती नहीं हैँ
अब तन बेतहाशा उछलता नहीं....
पक्के रंगों की तरह चढ़े बड्डप्पन के
अहसास से कोमलता धो गए...
बचपन का वो हिस्सा फ़िर से जीना है
तो चलो कुछ जतन करें.....
दुनियादारी को परे रख नासमझी में
खुद को डुबो गए....।
~ जया सिंह ~
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