रिश्तों की अंतिम सच्चाई

 रिश्तों की अंतिम सच्चाई :                          ******************

स्त्री और पुरुष प्रेम के अंतर को कैसे समझें..? क्या प्रेम-प्रेम में अंतर है? जब कोई हाथ छोड़ दे तो क्या करें...?

हाथ पकड़ना आसान है। हाथ छोड़ना भी आसान है। कठिन यह समझना है कि हाथ आखिर छोड़ा क्यों गया?

हममें से ज्यादातर लोग रिश्तों को उनके दिखाई देने वाले क्षणों से समझते हैं। कोई मुस्कुराकर हमारे पास बैठा है तो हम मान लेते हैं कि वह हमारे साथ है। कोई रोज फोन करता है तो हमें लगता है कि रिश्ता जीवित है। कोई हमारे हाथ में अपना हाथ रखे हुए है तो हम निश्चिंत हो जाते हैं कि वह कहीं नहीं जाएगा।

ऐसा होता है क्या...? कितने रिश्ते आदमी के छूटते हैं। टूटते हैं। रात दिन साथ रहने का वादा करने वाले भी अलग हो जाते हैं। क्यों...? 

रिश्तों की यात्रा शुरु कैसे होती है...? क्या मन से और फ़िर दूरी कैसे हो जाती है?  

मनुष्य का मन हाथ छूटने से बहुत पहले यात्रा शुरू कर देता है। शरीर वहीं रहता है, मन कहीं और चला जाता है और हमें अक्सर पता ही नहीं चलता कि सामने वाला कब हमसे दूर होना शुरू हो गया।

फ़िर एक दिन ज़ब वह कहता है, “मैं जा रहा हूं।” और हम चौंक जाते हैं।

हम कहते हैं, “ अरे कैसे, इतनी जल्दी ?? ”

लेकिन यह जल्दी नहीं होती। वह कई महीनों से जा रहा होता है। कई छोटी छोटी चुप्पियों के रास्ते। कई अधूरी बातचीतों के बीच।

कई बार रिश्ते किसी एक बड़े झगड़े से नहीं टूटते। वे छोटी-छोटी उपेक्षाओं से टूटते हैं। कोई बार-बार इंतजार करता है और दूसरा बार बार देर करता है। कोई अपनी बात कहता है और दूसरा सुनकर भी नहीं सुनता। कोई मन खोलकर सामने बैठता है और दूसरा कहीं व्यस्त रह जाता है। फिर एक दिन वह व्यक्ति शिकायत करना बंद कर देता है। जब शिकायत बंद हो जाए तो डरना चाहिए। शिकायत है तो अभी रिश्ता बचा होता है।

जिसे शिकायत है, वह चाहता है कि आप बदलें। जो चुप हो गया है, उसने बदलने की उम्मीद छोड़ दी है। रिश्तों की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि दो लोग अलग हो जाते हैं।  त्रासदी यह है कि दो लोग एक ही छत के नीचे रहते हुए भी एक दूसरे से बहुत पहले अलग हो जाते हैं।

इसलिए जब कोई पुरुष स्त्री का हाथ छोड़कर जाना चाहे, तो उसे एक बार रोक लेने में कोई बुराई नहीं। कभी-कभी पुरुष अपने दुख को क्रोध में छिपा लेता है। वह कहता है कि उसे कुछ नहीं चाहिए, लेकिन भीतर से चाहता है कि कोई उसे रोक ले। वह दरवाज़े तक जाता है और शायद मन ही मन चाहता है कि पीछे से कोई आवाज़ आए....

“ सुनो मत जाओ।”

ऐसी आवाज़ कभी-कभी किसी टूटे हुए रिश्ते में आखिरी दीपक जला देती है। लेकिन महिला के मन की यात्रा कई बार अलग होती है। वह बहुत देर तक भीतर ही भीतर अपने रिश्ते को बचाने की कोशिश कर सकती है। वह पूछती है। समझाती है। प्रतीक्षा करती है। नाराज़ होती है। फिर माफ करती है। फिर उम्मीद करती है।

और जब इन सबके बाद भी उसे वही खालीपन मिलता है, तो एक दिन वह लड़ना बंद कर देती है। उस दिन se उसका जाना शुरू हो जाता है। वो रहती तो है लेकिन चली जाती है।

यही रिश्तों का सबसे कठिन गणित है। हम अक्सर उस समय जागते हैं, जब सामने वाला सोने नहीं, जाने के लिए आंखें बंद कर चुका होता है। इसलिए किसी के जाने से पहले उसकी चुप्पी पढ़ना सीखिए।

एक वृक्ष जब सूखता है तो पहले उसकी शाखाएं नहीं गिरतीं। पहले भीतर कहीं रस कम होता है। बाहर से वह वैसा ही दिखाई देता है। पत्तियां भी कुछ समय तक हरी रहती हैं। फिर धीरे धीरे पेड़ अपनी हरियाली खो देता है।

बस रिश्ते भी ऐसे ही होते हैं।

प्रेम का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यही है कि हम अक्सर मौसम बदलने के बाद भी पुराने कपड़े पहने रहते हैं। हम चाहते हैं कि जो कल था, वही आज भी रहे। लेकिन जीवन नदी है। नदी किसी किनारे से वादा नहीं करती कि वह हमेशा उसी जगह बहती रहेगी।

प्रेम में कोशिश जरूरी है। लेकिन प्रेम अधिकार नहीं है। प्रेम किसी की स्वतंत्रता पर अपना नाम लिख देना नहीं है। प्रेम तो वह है जिसमें आप सामने वाले को इतना अपना मानते हैं कि उसके सुख में अपना सुख खोज सकें और दुख में अपना दुख।

हम जिसे प्रेम कहते हैं, उसमें हमारा एक हिस्सा स्वार्थ का भी होता है। हम चाहते हैं कि वह हमारे पास रहे क्योंकि उसके बिना हमें अकेलापन महसूस होगा। हम चाहते हैं कि वह हमें चुने क्योंकि उसके चुनाव से हमें अपने होने की पुष्टि मिलती है। लेकिन प्रेम इससे आगे है।

किसी के चले जाने के बाद सबसे कठिन काम उसे भूलना नहीं होता। सबसे कठिन काम यह स्वीकार करना होता है कि वह व्यक्ति अब आपकी कहानी का हिस्सा नहीं है।

कुछ लोग हमारी जिंदगी में रहने के लिए नहीं आते। वे हमें कुछ सिखाने आते हैं। वे बताते हैं कि प्रेम क्या है। वे यह भी बताते हैं कि अपेक्षा क्या है। वे हमें हमारी कमजोरियां दिखाते हैं। और फिर चले जाते हैं। हम उन्हें खोया हुआ समझते हैं। लेकिन शायद उन्होंने हमें हमारे भीतर का कोई ऐसा कमरा दिखा दिया होता है, जहां हम पहले कभी गए ही नहीं थे।

व्यक्ति चला जाए तो जाने दीजिए। प्रेम को मत जाने दीजिए। क्योंकि व्यक्ति हमेशा हमारे साथ नहीं रहता, लेकिन प्रेम से मिली समझ जीवन भर साथ चल सकती है।

.........यही शायद रिश्तों की अंतिम सच्चाई है।

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