दिमागी हलचल और नियंत्रण

 दिमागी हलचल और नियंत्रण :

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किसी स्थिति को ignore करना और उस पर reaction ना देना... क्या हर बार ये सम्भव होता है ?? हम मनुष्य हैँ और अच्छे बुरे के लिए react करना हमारा स्वाभाविक nature है। प्रवचन वगैरह में जो बोला जाता है कि कोई कुछ भी कहे अनदेखा करो जिसने खा उसे माफ़ करो वगैरह ये सब आसान लगते हैँ पर क्या वाकई होते हैँ  ?? 

आइये अब इसे थोड़ा सा गहराई से समझते हैँ। एक term है Nueroplasticity....मतलब ज़ब हम किसी stimulus से trigger होकर कोई specific reactions देते हैँ तो हम बस behaviour repeat नहीं कर रहे होते हैँ बल्कि अपने अंदर हम एक nural highway बनाते हैँ। जितना repetition उतना rigid pattern बनता जाता है। और एक दिन हम अपना व्यवहार उसी तरह का मान लेते हैँ। जबकि होता ये है कि ज़हनी तौर पर हम उस रस्ते पर इतना चल चुके होते है कि अब वो हमारा sub conscious default बन चूका होता है। 

इसीलिए क्षमा करना spiritual नहीं बल्कि दिमागी wiring का बस पेंच कसना होता है। प्रवचन में जो दूसरों को क्षमा करने के लिए कहा जाता है वो उन्हें innocent मानने का नहीं होता है। जबकि गलती तो उन्होंने की है। वो क्षमा हमारे nervous system के लिए जरूरी है। मतलब अगर किसी ने हमारे साथ बुरा किया तो वो एक घटना थी। लेकिन हम उस घटना के साथ रोज कितने ही पल जीते हैँ। उसे याद करते रहते हैँ। रोज उसे दोषी और ख़ुद को victim होने का तमगा देते है। जिसने बुरा किया उसे दोषी ना मानना तो सही नहीं है पर इसका दूसरा पहलू ये है कि बात उसे माफ़ करने की नहीं है .... जिस चीज़ को हम जितना अपने अंदर भरेंगे। हम उतने भारी होते जायेंगे। जबकि जितना हम उससे दूर रहेंगे तो शून्यता को पाएंगे। शून्यता मतलब शांति और सुकून। 

Hatred भी एक तरह का attachment ही है। बस उसमें प्रेम कि जगह जलन होती है। हम उससे नफ़रत के बावजूद जुड़े हैँ क्योंकि हम उसे दोषी बनाने के लिये बार बार सोचते हैँ। Dostoyevsky कहते हैँ...hell is the inability to love. अर्थात किसी को प्यार ना कर पाना नर्क है बल्कि उससे बड़ा नर्क है अपनी चोट को कुरेदते हुए past से नहीं निकल पाना। 

इसके लिए कुछ practices अगर शुरुआत कि जाएं तो बदलाव आ सकता है। ज़ब forgiveness कि ओर बढ़ेंगे तो पहले दिमाग़ बार बार यहीं कहेगा कि सब कुछ ठीक हो जायेगा हो रहा है। धीरे धीरे शरीर भी उस दिमाग़ कि राह पर चलने लगेगा। ये एक तरह का self hypnosis है। क्योंकि हम सब किसी ना किसी hypnosis में बंधे हुए हैँ। तकलीफ ख़ुशी डर ये सब एक तरह के hypnosis ही हैँ। जिनमें हम उलझें रहते हैँ। 

ऐसे में सोचना ये चाहिए कि ये character की limitations  का प्रभाव है। जिसके पास जो होगा वो वही देगा। उनके पास जो व्यवहार था उन्होंने हमें दिया। पर हमारे पास बदले में जो है वो उन्हें लौटाने के बजाये ख़ुद को दो। किसी भी घटना की acceptance ये मान कर करना की हर स्थिति सुलझने के लिये नहीं बनी होती। कुछ अनदेखा करके छोड़ देने के लिये भी होती है। इसलिये आज ये समझना जरूरी है की क्षमा दूसरों के लिए नहीं बल्कि ख़ुद के लिए होती है....। 


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