दस्तखत
दस्तख़त :
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कोई तो ज़रूर ही ज़बान से मुकरा होगा तभी तो दस्तख़त का चलन आया... पक्का वादा जो ज़बानी कर न पाए तभी भगवद्गीता पर कसम का वचन आया...
किसी ने तो कुचला होगा किसी का मन तभी बुझी आँखों से अश्रु रुदन आया... रिश्तों को गर संभाल लेते जो दर्द समझकर तो फ़िर क्यों हिस्से में कुढ़न आया...
थोड़े ठन्डे फाये साथ लेकर फिरा करो अब नहीं पता कब से जलन का प्रचलन आया ... कोई एक हाथ थामे रहना प्यार से सफ़र में नहीं जान पाओगे कब राह में निर्जन आया...
सच ही कहा था तो फ़िर डर कैसा और क्यों अनदेखा करो गर कुछ भी कथन आया... सिमित रहना चाहते हो तो फ़िक्र नहीं अब नई पीढ़ी में यही प्रचलन आया......!
जया सिंह
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