Smash the Patriarchy
Smash the Patriarchy :
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अगर सही मायनों में देखें तो मैं किसी राजनितिक पार्टी की पक्षधर नहीं हूँ सभी अपनी खामियाँ और खूबीयाँ हैँ। परन्तु कोई भी राजनितिक व्यक्ति अगर सही मुद्दे ओर बात करे तो वो बात सब तक पहुँचनी चाहिए। और ये बात दुनिया की आधी आबादी महिला समबन्धित है।
हिंदुस्तान में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने एक सभा की.... और सबकी एक ऐसी नस दबा दी है कि.. लोग बिलबिला रहे हैं...बौखलाए हुए हैं, अंदर ही अंदर उफन रहे हैं।
मगर सार्वजनिक तौर पर बोलने का जिगरा पैदा नहीं कर पा रहे।
हिम्मत नहीं हैँ.. औकात नहीं हैँ...... मुद्दा है
"Smash the Patriarchy."...
स्वतंत्र देश में लोकतांत्रिक प्रक्रिया के रास्ते सत्ता की हसरत रखने वाले किसी राजनेता ने शायद ही कभी खुले सार्वजनिक मंच से इस अंदाज़ में तमाम स्त्रियों से यह आह्वान किया हो कि पुरुषवादी व्यवस्था को जड़ से उखाड़ कर फेंक दो।
नेस्तनाबूत कर दो.........जमींदोज़ कर दो !
अगर आपको ऐसी कोई मिसाल याद हो तो बताइएगा। मुझे तो याद नहीं आती। और इसीलिए इस एक वाक्य के इर्दगिर्द जो बेचैनी दिखाई दे रही है वह अपने आप में बेहद आरामदेह....दिलचस्प है..।
"Smash the Patriarchy."...
1994 के अमेरिकी Zine Habitual Freak में इसकी मिसाल मिलती है।Feminist करिए Banet ने California में इसलिए इसके दूसरे अंक में एक कार्टून छपाया । जिसमें लिखा था...
“If I had a hammer… I’d SMASH Patriarchy.”
और फिर महिला कहती है...
“I FOUND IT!”
उस हथौड़े पर लिखा था — FEMINISM.
यानी patriarchy को तोड़ने वाला हथौड़ा मिल गया था और उस हथौड़े का नाम था फेमिनिज्म।
अद्भुत....
मतलब पुरुष के परमेश्वर होने के बुखार का भूत उतारने की दवाई मिल गई...
लेकिन.."Smash the Patriarchy"...के इस मिज़ाज को लता हयात की इस ग़ज़ल ने क्या खूब सँवारा है।
इसमें विद्रोह भी है... ख़ामोशी का टूटना भी है और सबसे बढ़कर अपने पंखों को आज़माने का ऐलान भी।
"हमें अब जगमगाना आ गया है! चराग़े दिल जलाना आ गया है !!
मेरी ख़ामोशियाँ भी बोलती हैं! उन्हें भी गुनगुनाना आ गया है !!
मैं जब चाहूँगी पिंजरा ले उड़ूँगी! परों को आज़माना आ गया है !
बात किसी से नफ़रत की नहीं है...बात व्यवस्था की है... उसके नियंत्रण की हैँ..
"मामला जब महिलाओं का आता है तो पुरुष अपने तमाम मतभेद भूलकर एक संगठित गिरोह की तरह एकजुट हो जाते हैं और फिर प्रहार करते हैं। यह कोई आज की बात नहीं है। यह सदियों से चली आ रही एक सामाजिक संरचना है।
पुरुषों के खिलाफ कोई ऐलान नहीं बल्कि उस व्यवस्था के खिलाफ सवाल है जिसने सदियों से यह तय किया कि औरत को कैसा होना है.. कितना बोलना है.. कहाँ जाना है और किस हद तक अपनी उड़ान आज़मानी है।
इसलिए जिसको बिलबिलाना हैँ.. चीखना हैँ.. बिलबिलाने दीजिये.. चीखने दीजिये...
और आप...इसलिए विचार पर ध्यान दीजिये।
"Smash the patriarchy
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