आधा अधूरा व अनिश्चितता में भी जीवन
आधा अधूरा व अनिश्चितता में भी जीवन :
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जिंदगी की हर कहानी बात या परिस्थिति का अंजाम सुखद नहीं होता कि कई बार झटके मिलते ही हम टूट जाते हैं। और हम ये बार बार सोचने लगते हैं कि मेरे साथ ही ऐसा क्यों....अचानक नौकरी चली जाए,दुर्घटना हो जाये,कोई करीबी की मृत्यु हो जाये तो मन खुद को ही कोसने लगता है कि मेरा ही भाग्य खराब है। मेरे ही साथ ये सब क्यों हुआ...ये सवाल एक जाल बनकर हमें उलझाने लगते हैं। मनोवैज्ञानिक भाषा में इसे क्लोज़र कहते हैं। जहां पहुंचकर इस घटना को पूरा मान लेना साथ ही सारी सोच को बस इस बात पर रोक लेना कि मेरा ही भाग्य खराब है।
ये क्लोज़र थोड़ा बहुत सुकून तो देता है पर खुद पर से भरोसा उठाने लगता है। ड्रेक यूनिवर्सिटी की समाजशास्त्र की एक प्रोफेसर की किताब " Closer- rush to end grief and what it cost us" में लेखिका अपने खुद के जीवन के कुछ भयावह घटनाओं के हवाले से ये बताती है कि इंसान को जीवन में खुशी और शोक दोनों के लिए जगह बनाकर रखनी चाहिए। क्योंकि क्लोज़र हर बार सुकूँ नहीं देता।
कुछ लोग अनिश्चितता को जल्दी नहीं स्वीकार कर पाते। और चाहते हैं कि कोई सकारात्मक नतीजा जल्दी आ जाये। लेकिन जो लोग बीती घटनाओं को सबक की तरह याद रखते हैं उन्हें मौकों को तरह स्वीकार करते है। वह अपेक्षाकृत ज्यादा संतुलित रहते हैं। जैसे तलाक कोई अंत नहीं, वहां से जिंदगी की एक नई शुरुआत हो सकती हैं।
असल में जरूरी नहीं कि हर सवाल का जवाब मिल जाये। कई बार जिंदगी आगे बढ़ने की इजाज़त तभी देती है जब हम कुछ सवालों को वही उसी दशा में छोड़ कर आगे बढ़े। अधूरी बातों के साथ जीना भी मानसिक मजबूती के सबूत होता है। क्योंकि तब हम परिस्थितियों को जस के तस स्वीकार करने के काबिल बनने लगते हैं। ये समय के साथ इंसान को शांत और स्थिर बनाता है। जिंदगी में हर चीज़ मुक्कमल नहीं होती। इसलिए कभी कभी आधे अधूरे और अनिश्चितता में ही सुकून ढूंढना पड़ता है।
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