ऋग्वेद - प्रथमेश परिचय
ऋग्वेद - प्रथमेश परिचय
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सनातन धर्म की परंपरा में ऋग्वेद सबसे पुराना और ऐतिहासिक ग्रंथ हैं।ऋग्वेद हिन्दू पहचान के रूप में इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जिसने हिंदुओं को भारत का मूल निवासी प्रमाणित किया है। इसे भारतीय यूरोपीय भाषा में रचित किया गया है। 3800000 BC से लेकर 4200000 BC के बीच इसका काल माना गया है। इसकी रचना भारतीय उपमहाद्वीप उत्तर पश्चिमी क्षेत्रों में की गई। इसमें देवी देवताओं से सम्बंधित अधिकतम प्रचलित कथाएं एवं उनकी स्तुति के श्लोक, मंत्र और पूजन की अति उत्तम विधियों का उल्लेख है। इस ग्रन्थ को इतिहास की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण माना जाता है।
ऋग्वेद को सहिंता के रूप में देखे जाने पर इसमें 10 मंडल या भाग मिलते हैं। इन भागों में अलग अलग तरह के संस्कार विधाएं और भक्ति सम्बन्धी नियम लिखे गए हैं। मान्यता है कि पहले वेद एक संपूर्ण संहिता के रूप में थे। पर बाद में व्यास ऋषि ने अध्ययन की सुगमता के लिए इन्हें चार भागों में बांट दिया। इसीलिए कालांतर में उन्हें वेद व्यास ऋषि के नाम से जाना जाने लगा।
ऋग्वेद में 1028 सूक्त भी हैं। जो कि हर मंडल में कथाओं के संजोग से शामिल किए गए हैं। वेद मंत्रों के समूह को सूक्त कहा जाता है। ये वेदों में शुद्ध रूप में रहते हैं जिनसे ईश्वर उपासना और यज्ञों के समय इनका उच्चारण किया जाता था। सूक्तों में साकार और निराकार दोनों ही तरह ईश्वर की आराधना का ज्ञान दिया गया है। सूक्त को चार भागों में समझ सकते हैं। देव, ऋषि, छंद एवं अर्थ। क्रमवार सबसे पहले किस देवता की उपासना है... कौन से ऋषि उसका उच्चारण कर रहे...किस तरह उसे छंद में उल्लेखित किया गया और उसका अर्थ क्या है।
ऋग्वेद में 10580 ऋचाएं हैं। पद्य में रचे गए श्लोकों या मंत्रों को ऋचाएं कहा जाता है। ऋचा की उत्पत्ति ऋक शब्द से हुई है जिसका अर्थ है प्रशंसा करना। अर्थात देवताओं के गुण में गाये जाने वाले मंत्र और श्लोक। ऋचाओं को पढ़ने व पढ़ाने वाले ऋषियों को होतृ कहा जाता था । पद्यमय अर्थात जो लयबद्ध होते हैं वो भजन, वेद मंत्र स्रोत ये सब ऋचाओं के ही क्षेत्र में आते है।
ऋग्वेद में 33 देवी देवताओं का वर्णन मिलता है। इसमें सूर्य, उषा अदिति, अग्नि और इंद्र जैसे देवताओं का उल्लेख है। इसमें इंद्र को सबसे शक्तिशाली देव माना गया है। ऋग्वेद में इंद्र की स्तुति में तकरीबन 250 ऋचाएं हैं। ऋग्वेद के एक मंडल में एक देवता की स्तुति में मंत्र है वो है सोम देवता।
ऋग्वेद में बहुदेववाद अर्थात एक साथ बहुत से देवताओं की उपासना, एकेश्वरवाद अर्थात किसी एक देवता की भक्ति का भी वर्णन भी मिलता है। ऋग्वेद में सृष्टि रचयिता ब्रम्हा के भी निर्गुण स्वरूप की उपासना का उल्लेख है।
ऋग्वेद में पूज्य 25 नदियों का भी वर्णन है। जिसमें सिंधु, सरस्वती , गंगा और यमुना प्रमुख है। इन नदियों को जीवन और धर्म दोनों से जोड़कर देखा गया है। गाय को आह्नया कह कर संबोधित किया गया है। गऊ को भी देवतुल्य मने जाने के वर्णन है।
ऋग्वेद में ग्रामों के समूह को विश कहा जाता था। और अनेक विशों के समूह को जन कहते थे। बड़े प्रशानिक क्षेत्र को जनपद भी कहा जाता था। जनों के प्रधान को राजा या राजन कहते थे। आर्यावर्त में प्रमुख पांच कबीले होते थे जिन्हें पाञ्चजन्य कहते थे। इनके नाम थे पुरु, यदु,अनु तुर्वशू, दहर्व्यू ।
ऋग्वेद में ऐसी कन्याओं के भी उल्लेख मिलता है जो आजीवन अविवाहित रहती थी जिन्हें अमाजू कहा जाता था। ये मंदिरों में रहती थी और प्रभु सेवा करती थी।
ऋग्वेद में बहुआस्तिक्यवाद और एकास्तिक्यवाद का भी वर्णन है। हिन्दू धर्म बहु अस्तिक्यवाद को आधार मानता है । जैसे कई सारे देवी देवताओं की एक साथ पूजा अर्चना करना। सभी को एक सामान श्रेष्ठ मानना। ईश्वर के ये सभी अवतार पारलौकिक होते हैं। जबकि कुछ दूसरे धर्म एकास्तिक्यवाद के आधार पर एक ही ईश्वर को मानते हैं जैसे ईसाई धर्म यीशु को, इस्लाम धर्म खुदा को। ऋग्वेद में बुतपरस्ती का भी वर्णन है जिसमें हिन्दू धर्म, यूनानी धर्म, रोमन धर्म ,चीनी धर्म आदि में बुत को ईश्वर बनाकर उनकी पूजा अर्चना की जाती रही है।
ऋग्वेद में ही मृत्युनिवारक महामृत्युंजय मंत्र , विश्व विख्यात गायत्री मंत्र भी उल्लेखित है। अनेक प्रकार के लोकोपयोगी सूक्त जैसे रोग निवारक सूक्त, संस्कार सूक्त, विवाह सूक्त, तत्वज्ञान सूक्त, आदि वर्णित है। इसमें भारतीय देवता के रूप में अग्नि जल वायु सोम का भी वर्णन मिलता है।देवताओं का यज्ञ द्वारा आह्वान करने के लिए भी खास मंत्रों और सूक्त का वर्णन है।
ऋग्वेद को बहुत हद तक समझने के लिए इतना सार पर्याप्त है। मूल बिंदुओं को जान लेने के बाद ऋग्वेद को जाना जा सकता है। हर वेद का सार भिन्न भिन्न है। लेकिन सभी धर्म और आस्था की बात करते हैं।
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