DINK- नई जीवनशैली

DINK- नई जीवनशैली

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विकसित होती हुई जीवनशैली और बदलती विचारधाराओं के चलते आजकल समाज में एक नया concept जन्म ले रहा है। 

◆ DINK अर्थात double income no kids.

मतलब अब पति पत्नि दोनों कमाऊ होंगे पर अपनी कमाई हमेशा को बरकरार रखने के लिए बच्चे नहीं पैदा करेंगे। अकेले रहेंगे और जिंदगी को अपनी मर्ज़ी के अनुसार जिएंगे। 

हां अगर अकेलापन महसूस होता है तो कुत्ता बिल्ली पाल लेंगे। पर अपने बच्चे नहीं करेंगे। 

पता नहीं ये नया समय कौन कौन से अजूबे सामने लाएगा। पुराने समय में लोग 5-6 बच्चे तक कर लिया करते थे और सभी बच्चे बहुत अच्छी तरह पल भी जाते थे। परिवार में चहलपहल भी बनी रहती है। धीरे धीरे परिवार 2 बच्चों तक सिमटने लगा। उसमें भी कोई बुराई नहीं लगी। क्योंकि हम दो हमारे दो वाली सोच के साथ परिवार की रूपरेखा भी बढ़िया तरीके से सम्भल रही थी। 

लेकिन फ़िर कुछ दंपतियों में ये चलन भी देखने को मिला कि सिंगल चाइल्ड ही करना है। क्योंकि जितने बच्चे उतना खर्च और जिम्मेदारी। अकेला बच्चा दो बड़ों के साथ जिंदगी ने बहुत सी मासूम हरकतों से वंचित रह जाता। हमेशा उससे maturity के व्यवहार की उम्मीद की जाती। वो अपने बचपने को भी खुल कर enjoy नहीं कर पाता। 

अब चलन आ गया कि बच्चा ही नहीं करेंगे। मतलब बच्चे बोझ हैं, जिम्मेदारी हैं,परेशानी हैं और खुलकर जीने में बाधक हैं। शायद यही सोच होगी तभी तो ये चलन समाज में पनपा। 

जबकि एक परिवार में बच्चे सिर्फ वंश को आगे बढ़ाने का ही काम नहीं करते बल्कि वो माता पिता के बीच सेतु होते हैं। वो माहौल बनाते हैं। एहसासों को पुनर्जीवित करते हैं। बोरिंग जिंदगी में उल्लास भरते हैं।अपनी मासूम हरकतों से थकन और अनमनेपन को खुशी में बदलते है। 

हां ये सच है बच्चे जिम्मेदारी होते हैं पर वो जिम्मेदारी जो जीवन में खुशियां लाती हैं। ना कि बस बंधन। एक ऐसी जिंदगी जो बस दफ्तर घर और मोबाइल तक सिमटी हुई हो उसमें कुछ नया रंग कैसे आएगा ?  वो बच्चे से ही आएगा। और ये बदलाव अपनेपन से जुड़ा है। क्योंकि अपने बच्चे के लिए कुछ करने से माँ बाप को खुशी ही मिलती है। 

जानवर पाल लेने से मन तो बहल सकता है। पर अपनी औलाद होने की पूर्ति नहीं हो सकती। दंपति ये नहीं सोच सकते कि आज जो कुछ उन्होंने जो कुछ अपनी जिंदगी और गृहस्थी में जोड़ा है वो उसे अपने बच्चे के लिए छोड़ कर जाएंगे। उसे भोगने वाली उनकी ही औलाद है। नहीं तो उनके मरने के बाद वो सब कुछ यूं ही व्यर्थ हो जाएगा। 

बच्चा होना परिवार को ही नहीं समाज को भी पूर्ण करता है। मानसिकता बदलती है। वैवाहिक व्यवस्था मजबूत होती है। जिंदगी जीने का नज़रिया बेहतर होता है। दफ्तर से घर आने पर मन लगाने के वास्ते अपना बच्चा होता है। 

ऐसी बहुत से साक्ष्य हैं जो महसूस किए जा सकते हैं पर नई पीढ़ी को क्या ही कहा जाए। हम जो 50 + हैं अपनी ज़िन्दगी जीकर चले जायेंगे। कब तक उनकी परेशानियों में अपना सहयोग देँगे। आगे उनकी परेशानियों में कोई खड़ा होने वाला नहीं होगा। क्योंकि जवानी तो शौक शौक में कट जाती है। असल परीक्षा बुढ़ापे में होती है। जब असहायता हावी हो जाती है। 

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