बोलती हुई शिकायतें

बोलती हुई शिकायतें :

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दम घोंटती हुई खामोशियों से बेहतर 

बोलती हुई शिकायतें हैँ 

जिसे मन अस्वीकारे वो सामाजिक सरोकार 

नहीं बस रिवायतें हैँ 

जज़्ब कर लिए हैँ कुछ सबक फ़िर भी 

जिंदगी उथलपुथल सी है 

अनुभवों की ठोस ज़मी, ज़िन्दगी में 

स्थिरता लाने वाली इनायतें हैँ 

हो सके तो थोड़ी बेबाक अभिव्यक्ति 

करने की आदत डाल लो 

दूसरे को चुप्पीयां बाँट देने का जोर 

एकाधिकार की सियासतें हैँ 

बस उनके मन की सुनो अपनी ना कहो....

ये कहाँ तक ठीक है 

क्या उनके लिए भी अभिव्यक्ति की 

सीमा की कुछ हिदायतें हैँ 

अब जो मन में है खुलकर कहना है 

वक़्त कब बदल जाए पता नहीं 

भले दुनिया समाज में हमारी 

विचारधारा की कितनी खिलाफतें हैँ 


~ जया सिंह ~


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