संबंधों की परिभाषा
संबंधों की परिभाषा : •••••••••••••••••••••
आजकल भारतीय मिडिया में रक्षाबंधन के अवसर पर एक तस्वीर बहुत चलन में है। जिसमें राहुल गाँधी अपनी बहन प्रियंका को गाल पर kiss कर रहे हैं। उस तस्वीर पर जिस तरह के reactions मिल रहे या उसे जिस नज़रिये से देखा जा रहा उस पर सोचा जाना ज़रूरी है।
दअरसल एक घोर आदर्शवादी का मस्तिष्क सड़ांध भरा होता है बेहद सड़ांध भरा। इस तथाकथित संस्कारी और मर्यादा का ढिंढोरा पीटने वाली जमात के लिए एक उम्र के बाद बहन को छूना भी त्याज्य है क्योंकि इनके लिए बहन एक पेट से जन्मी बहन नहीं सिर्फ़ एक स्त्री शरीर है। और इनकी यौन लिप्सा इतनी प्रबल है कि बहन को किस कर लेने भी उत्तेजित होती है।
ये अभागे तो दिन में अपनी पत्नी को भी छू नहीं सकते, kiss नहीं कर सकते (यू नो मर्यादा)। पत्नी को सिर्फ़ तब छूना है ज़ब शरीर की ज़रूरत का वक़्त हो रात हो क्योंकि छूने का मतलब ही sex है।
कितनी ही पत्नियां emotional mental emptiness से जूझ रही होती हैं कि उन्हें हसबैंड से कभी warm hug नहीं मिलता, कभी एक प्यारा सा non sexual kiss नहीं मिलता। उनके पति को सिर्फ़ बिस्तर के वक़्त उनका शरीर चाहिए बाक़ी टाइम वो कैसी हैं क्या कर रहीं कोई appreciation नहीं......
जबकि अपने प्रियजन से एक प्यार भरा warm hug या forehead kiss तमाम तनाव, दुख से मुक्ति देकर एक सुरक्षा, एक भरोसे का एहसास दिलाता है कि नहीं मैं अकेला नहीं हूं। It can enhance mental health, it can make whole day beautiful...it works like a therapy, makes you feel important.
खैर, Hug/ cuddling/ kiss ये सब हमारी संस्कृति में वर्जित है। बड़े हो जाने पर भाई, पिता, मां, बहन को तो दूर पत्नी तक को छूना भी aloud नहीं है सबके सामने।
वह अलग बात कि यही कुंठित आदर्शवादी लोग भरी भीड़ में छिपकर, बसों में ट्रेनों में अनजान औरतों के शरीर में उंगलियां, कोहनी कोँचते रहते हैँ। कोई भी public place हो या कार्यस्थल हर जगह औरत छूने और मज़े लेने की चीज़ है।
आदर्श संस्कृति का रूल - जो करो छिपकर करो।
भारतीय संस्कृति में एक यही बात समझ से परे है की जायज संबंधों को भी ढके छुपे तरीके से निभाया जाता है। उन पर भी सामाजिक पाबंदियों के पहरे हैँ। जबकि संबंधों में तब मजबूती आती है ज़ब उन्हें खुलकर पनपने के लिए space दी जाती है। पिता पुत्री, माँ बेटा, भाई बहन, देवर भाभी, जीजा साली जैसे कई रिश्ते हैँ जो लिंग से परे अपनेपन से जुड़े होते हैँ। जिसमें छू लेना वासना नहीं होता। बल्कि उम्र का एक फासला होता हैँ। छोटे बड़े का अहसास होता है....तभी उस स्पर्श में लालसा नहीं ममता होती है।
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