खुद का ही पता नहीं

ख़ुद का ही पता नहीं :            •••••••••••••••••••

खुद का ही पता नहीं है हमें पर

दूसरों को सब ठीक होने का दिलासा देते रहते हैं 

अच्छे दिन कितनी जल्दी गुजर जाते हैं

पर बुरे दिनों में कई सबक हौले हौले लेते रहते हैं

बस सबर आने भर की ही देरी है फ़िर 

ख़ास क्या और खाक क्या, सब बराबर ही तो है

हमारा चुप होना तो देखा सबने पर

ये नहीं पहचाना कि अंदर कितना समेटे रहते हैं

कुछ बिखरा बिखरा सा रहता है अंदर

वो ख़्वाब हैं या ख्वाहिशें ये ही पता नहीं है हमें

वो टूटेंगे तो हम पूरी तरह टूट जाएंगे

बस इसी एक वजह से हमेशा ही डरते रहते हैं

      ~ जया सिंह ~

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