जेब पर भारी पड़ते शौक

 जेब पर भारी पड़ते शौक : 

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आजकल लोगों में शॉपिंग का कुछ ज्यादा ही क्रेज देखने को मिल रहा। चाहे वो ऑनलाइन शॉपिंग हो या विंडो शॉपिंग या फिर रियल शॉपिंग। ऑनलाइन होने से घर बैठे जो खरीदारी की सुविधा मिली है उसने खर्चे बहुत बढ़ा दिए हैं। हर समय कुछ ना कुछ दिखता रहता है जो पसन्द भी आता रहता है। चीजों का चलन बदलता रहता है। और मन किसी एक चीज़ पर नहीं ठहरता। इसलिए हर बार कुछ नया लेते रहने का चक्कर इस खरीदारी में उलझाए रखता है। कभी कभी हम बहुत सी वो चीजें भी ले लेते हैं जो हमारी कार्ट में नहीं है। ये क्षणिक इच्छा आकर्षक और मूड के आधार पर हो जाता है। इसे नियंत्रित करने के लिए कुछ पॉइंट्स में समझना होगा। 

1. शौक या आदतन खरीदारी : कुछ लोगों को खरीदारी करने या मार्केट जाने का शौक होता है। उनको ये अच्छा time pass लगता है। जबकि ये time pass उनके खर्चे के balence को बिगाड़ देता है। बहुत सी चीजें सिर्फ अच्छी लग रही हैं इसलिए घर आ जाती है। जबकि उनकी जरूरत नहीं होती। 

2. सामाजिक दबाव या तुलना : आजकल सोशल मीडिया और समाज दोनों हमें तुलनात्मक बना रहे हैं। उसने ये नया लिया तो मुझे भी लेना चाहिए। अगर उससे ज्यादा प्रभावशाली दिखना है तो मेरे पास ये होना चाहिए। बड़े और बड़े होने की चाह ने बस हर नई चीज को पाने की जिद मन में पैदा कर दी है। 

3. दिखावा और प्रतिष्ठा : महंगी चीजें फ़ोन कपड़े एसेसरीज ये सब सिर्फ दिखावे के लिए खरीदी जा रही हैं। ब्रांडेड चीजों के प्रति लालसा ने महंगी से महंगी चीजों को जिद बना दिया है। अब जरूरत के हिसाबसे नहीं बस दिखाने के लिए चीजें ली जाती हैं

4. मौका छूट ना जाये :  अमूमन कंपनी सेल या डिस्काउंट का झांसा देकर खरीदारी को उकसाती हैं।हम ये सोच कर खरीद लेते हैं कि आज नहीं खरीद तो कल ये महंगा मिलेगा। बस ये सेल का आकर्षण हमें बांध देता है। कभी कभी तो सेल की लालच में  दोहरे तिहरे समान आ जाते हैं।

5. छोटी मोटी जरूरतें :कुछ जरूरतें शुरू में दिखाने के लिए की जाती है पर बाद में वो आदत बन जाती हैं। और वही आदतें खर्चे बढ़ाती है। जैसे मान लें पहले ऑटो से travel करते हों पर दूसरों को दिखाने के लिए टैक्सी करनी शुरू कर दें। तो ये खर्चे का बढ़ना ही है। महीने के अंत में ये बड़े खर्चे के रूप में एक बड़ा अमाउंट लिए दिखते हैं।

6.भावनात्मक खर्च : जब मूड खराब हो, बोर हो रहे हो , उदास हो गुस्सा हों तब खरीदारी करने नहीं जाना चाहिए। क्योंकि तब मन और दिमाग ठीक से साथ नहीं दे रहा होता है। ऐसे समय में संगीत सुनना या मेडित7 करना ज्यादा बेहतर होगा। 

ये बहुत से कारण है जिनकी वजहँ से खर्च बढ़ रहे हैं । अब इसे रोकने के तरीके समझते हैं।

◆ हर हफ्ते में दो तीन दिन no order day रखें । जिस दिन किसी भी तरह की कोई ख़रीदारी करने से बचा जाए। 

◆ शौक को सही दिशा दी जाए। बागवानी पेंटिंग , किताब पढ़ना आदि ये सब खर्च के बिना भी हो सकते हैं

◆ तुलना से बेहतर खुदको और व्यवस्थित करने में प्रयासरत होना चाहिए। क्योंकि हर कोई एक जैसा हो ये जरूरी नहीं पर हम बेहतर बन सकते हैं।

◆सब्सक्रिप्शन की जरूरत पर ध्यान दिया जाए जो गैरजरूरी है उसे बन्द कर दिया जाए। 

◆जीवनशैली में बदलाव से खर्च रोका जा सकता है। थोड़ी दूरी हो तो पैदल चले, सार्वजनिक वाहन का use करें घरेलू काम खुद करें घर का खाना खाएं वग़ैरह वग़ैरह

◆ देखादेखी महंगी चीज़े ना खरीदी जाएं जरूरत कर हिसाब से चीजें खरीदें।

◆ वो लोग जो वास्विकता को महत्व देते हैं ऐसे संगी जाति बनाएं। जो सिर्फ भ्रम और चकाचौंध में जीते हो वो कभी सगे हजन बन सकते। 

◆ सेहत पर खर्च ज्यादा जरूरी हैं इसलिए वस्तुओं से ज्यादा शरीर के स्वास्थ्य के लिए खर्च किया जाए। 

◆रोज के खर्च लिखने की आदत ये बताएगी की कितना खर्च हो रहा है। 

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