तन मन का साथ
तन मन का साथ :
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शरीर के साथ मन का होना जरूरी है
हर यात्रा तभी सफल है जब काया के
साथ ही इस मन की उपस्थिति पूरी है
कोई भी जगह हो, स्थिति हो या समय
सिर्फ तन के संग उसके नहीं हो सकते
जब तक मन ना साथ हो उस मंजर से
जुड़ने की कोशिशों के बाद भी दूरी है
झूठा सा रिश्ता होयेगा उससे तन का
जबकि मन कहीं और रचा बसा होगा
अगर वाकई जुड़ने की प्रबल आस है तो
तन संग मन को बंधे रखने की मंजूरी है
कितने ही रोचक पल छूकर गुजर जाएं
मज़ा तभी है जब उसमें रुचि शामिल हो
इसीलिए सही है कि तन और मन की
जुगलबन्दी के बिना तो हर शै अधूरी है !
~ जया सिंह ~
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