भोज्य सम्बंद्धि नियम
भोज्य सम्बन्धी नियम :
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हम ज़्यादा खाते हैं — इसलिए बीमार हैं
दिन में तीन बार खाना
मानव इतिहास के सबसे बड़े धोखों में से एक है।
कोई डॉक्टर यह साफ़-साफ़ नहीं कहेगा।
कोई मेडिकल पाठ्य-पुस्तक इसे स्वीकार नहीं करेगी।
क्योंकि यह झूठ अनेक उद्योगों को ज़िंदा रखता है।
इस भ्रम को समझने के लिए
हमें 1750 से पहले लौटना होगा।
अंग्रेज़ों से पहले।
घड़ी के शासन से पहले
उस समय से पहले
जब भोजन आज्ञाकारिता बना दिया गया।
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भारत समय से नहीं —
सूर्य के उगने और डूबने से खाता करता था।
भारत ने कभी
घड़ी देखकर खाना नहीं खाया।
यहाँ भोजन होता था.....
सूर्य के अनुसार,
ऋतु के अनुसार,
श्रम के अनुसार,
और सबसे महत्वपूर्ण.....
भूख के अनुसार।
अधिकांश भारतीय
एक ही मुख्य भोजन करते थे
या कभी-कभी दो,
तीन तो कभी भी नहीं।
भोजन प्रायः
देर सुबह या दोपहर में होता था।
सूर्यास्त के बाद
भारी भोजन लगभग नहीं होता था।
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उपवास कोई दंड नहीं था
उपवास सज़ा नहीं हुआ करता था।
वह संस्कृति था
वह जैविक बुद्धि था
वह आध्यात्मिक अनुशासन था
एकादशी।
प्रदोष।
नवरात्रि।
चातुर्मास।
ऋतु-आधारित तमाम व्रत उपवास
भूख से डर नहीं था बल्कि
भूख का सम्मान था....।
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भोजन स्थानीय हुआ था.....
जीवन से जुड़ा हुआ
खाद्य पदार्थ
ताज़ा तरीन थे और
ख़ासकर स्थानीय थे
ऋतु के अनुरूप थे
मोटे अनाज...ज्वार, बाजरा, रागी
कंद-मूल, दालें, देशी घी, दूध
वन-आधारित भोजन
चावल और गेहूँ
रोग थे मगर
मेटाबोलिक रोग नहीं थे
मोटापा दुर्लभ था
मधुमेह लगभग अदृश्य था
हृदय रोग जीवन-शैली नहीं बने थे
शरीर दुबले थे
मांसपेशियाँ कार्यशील थीं
किसानों के शरीर
जिम के बिना सिक्स-पैक थे
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फिर अंग्रेज़ आए
और उन्होंने
सिर्फ़ भूमि पर क़ब्ज़ा नहीं किया
उन्होंने
समय को उपनिवेश बनाया।
भोजन को उपनिवेश बनाया
चयापचय (Metabolism) को उपनिवेश बनाया।
उन्हें चाहिए थे
अनुमानित मजदूर और
अनुमानित घंटे, अनुमानित उत्पादकता
इसलिए उपवास हटाना गया
भोजन की स्वायत्तता खत्म करनी पड़ी
धीरे-धीरे, चुपचाप
एक नया ढाँचा खड़ा किया गया
सुबह = नाश्ता
दोपहर = भोजन
रात = रात का खाना
यह स्वास्थ्य मॉडल नहीं था
यह कर वसूली का मॉडल था
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अगला वार खाद्य संप्रभुता की हत्या
हर भारतीय घर कभी एक खाद्य इकाई था
स्व-संरक्षित,स्व-निर्भर, स्व-पोषित।
इसे नष्ट करना ज़रूरी था
विविध अनाज हटाए गए
चावल और गेहूँ थोपे गए
क्यों...? ?
आसान भंडारण
आसान परिवहन
आसान कर
आसान नियंत्रण
इसलिए नए नियम बने
रसोई बाज़ार बन गई
खेती नक़दी फसल बनी
खाना निर्भरता बन गया
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1947 आया — आज़ादी आई,
पर व्यवस्था नहीं बदली
सरकार ने भी अंग्रेज़ी मॉडल को ही देखा
और मुस्कुराई—
“कितनी शानदार कर मशीन है!”
फिर आई
हरित क्रांति।
1950–60 का दशक।
गेहूँ और चावल
सीमेंट की तरह जम गए।
MSP का नशा दिया गया।
मोटे अनाज ग़ायब हो गए।
विविधता मर गई।
किसान संप्रभु नहीं रहे।
वे आपूर्तिकर्ता बन गए।
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फिर दूसरा उद्योग फूटा — बीमारी
कार्बोहाइड्रेट-भारी आहार आए
और साथ आए—
मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, मोटापा।
बीमारियाँ अनुमानित थीं पर
मरीज़ स्थायी थे।
और बीमा फला-फूला
अस्पताल बढ़ने लगे
दवाइयों ने घर में जगह बनाई
सरकार फिर मुस्कुराई....
भोजन कर
दवा कर
अस्पताल कर
बीमा कर
नागरिक बैटरियाँ बन गए
खाओ
काम करो
दवा लो
कर दो
दोहराओ
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काग़ज़ों में उम्र बढ़ी —
जीवन नहीं
लोग अधिक नहीं जी रहे।
वे केवल
ज़्यादा समय तक ज़िंदा रखे जा रहे हैं।
गोलियों पर
इंजेक्शन पर
रिपोर्ट्स पर
स्वस्थ रहने के लिए नही......
कर देने के लिए ज़िंदा
यह स्वास्थ्य नहीं है
यह सभ्यतागत पतन है
और हम अब भी
इस मैट्रिक्स में फँसे हैं।
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असल प्रश्न यह नहीं है…
“आप बीमार क्यों हैं?”
असल प्रश्न है—
जब आप दिन में तीन बार खाते हैं,
तो लाभ किसे होता है....? ? ?
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