आस्तिकता बनाम नास्तिकता
आस्तिकता बनाम नास्तिकता :
•••••••••••••••••••••••••••••
सबसे पहले एक सवाल सभी को....तर्क से सोचने के लिए,
अगर सिर्फ आस्था से, दिल से मानने से (किसी भी धर्म के) ईश्वर/अल्लाह/जीजस का अस्तित्व सिद्ध हो जाता है.....अगर मानने से पत्थर या कोई मूरत या कुछ और भी, ईश्वर बन जाता है तो .....
◆ किसी गरीब के लिए कोई भी कागज, पैसा क्यूँ नहीं बन जाता..??
◆किसी भुखे के लिए सड़क का कचरा, खाना क्यूँ नहीं बन जाता..??
◆ किसी प्यासे के लिए रेगिस्तान, मीठे पानी का तालाब क्यूँ नहीं बन जाता..??
◆ किसी मरनेवाले के लिए ईश्वर की प्रार्थना, जीवन क्यूँ नहीं बन जाता...??
ऐसे हजारों सवाल हैं जो सामने आ सकते हैं...!!
● क्या मानने से किसी भी चीज का अस्तित्व सिद्ध हो जाता है...??
उपर लिखे सवालों से समझ सकते है की सिर्फ मानने से किसी भी चीज का अस्तित्व सिद्ध नहीं हो जाता है। अस्तित्व सिद्ध करने के लिए सिद्धांतों और प्रमाणों की जरूरत होती है। और ऐसे सिद्धांतों और प्रमाणों को भी नये-नये सिद्धांतों और प्रमाणों के साथ चुनौती दी जा सकती है।
यही तो खूबी है नास्तिकता की.....तार्किक और शास्त्रीय होने की, पढ़ने-लिखने की, सोचने की, सवाल करने की।
● आस्तिकता और नास्तिकता में क्या फर्क है....??
● आस्तिकता मतलब किसी भी चीज के अस्तित्व को, दावों को....बिना किसी प्रमाण के, उसे मानकर, वास्तविकता को नजरअंदाज करके (मानवनिर्मित?) काल्पनिकता को ही अंतिम मानना।
इस मानने की वजह अनेक हो सकती है जैसे अशिक्षा, भय, उम्मीद, कट्टरता, मान्यता और परंपराओं के उपर सवाल उठाने के खिलाफ सामाजिक डर, इत्यादी।
और............
●नास्तिकता- मतलब किसी भी चीज के अस्तित्व को, दावों को....सिद्धांतों और प्रमाणों के पैमानों पर तौलना। उसकी वास्तविकता और काल्पनिकता की तुलना प्रमाणों के साथ सबके सामने रखना। और फिर उसे भी किसी नई चुनौती के लिए खुला रखना।
●अब आते है....दुनिया या किसी भी समाज में ज्यादातर लोग आस्तिक क्यूँ होते है......??
ज्यादातर लोगों को "आस्तिकता" विरासत में (मतलब मां-बाप, परिवार से, समाज और धर्म-जाती के डर से) मिलती है। सिर्फ और सिर्फ इसी कारण से ज्यादातर लोग आस्तिक दिखते है। आस्तिकता एक बिना प्रमाण किया हुआ (अंध)विश्वास है, जो या तो डर या स्वार्थ या उम्मीद या भेदभाव, ऊन्माद से जन्मा है। वह झूठे दिलासे और सपनों की बजाय कुछ नहीं देता। और देता है तो बस पाखंड, कट्टरता, धर्मांधता, कर्मकांड, अंधविश्वास, लूटपाट, धोखाधडी, जादू-टोना इत्यादि।
और ऐसा भी नहीं है की सिर्फ गरीब या अनपढ लोग ही जाति-धर्म या मंदिर-मस्जिद के चक्कर में उलझे रहते हैं। बल्कि कई पढ़े-लिखे और अमीर लोग भी अंधविश्वास, धर्मांता, कट्टरता इन सब के चक्कर में डर या स्वार्थ की वजह से है गिरे रहते हैं।
जिस दिन लोगों को ये सच समझ आ गया, उस दिन से वह अलग सोच पायेंगे और एक बेहतर जिंदगी जी पायेंगे।
वर्ना सभी के जीवन की शुरुआत अगर ऐसी "विरासत" के बजाय शिक्षा, ज्ञान-विज्ञान, मान्यता और परंपराओं के उपर सवाल उठाने का साहस और सामाजिक खुलापन, इत्यादी से हो जाए, तो ज्यादातर लोग नास्तिक दिखेंगे।
●अब समझते है की नास्तिक लोग खुलकर अपनी बातें क्यूँ नहीं रखते है या क्यूँ नहीं रख पाते है......??
किसी भी धर्म के लोग जो नास्तिक है वो ज्ञान-विज्ञान, तर्क, विवेक, प्रमाण इत्यादी को मानते है। तो स्वाभाविक है की वो सब ईश्वर-आस्था, अंधविश्वास, अंधश्रद्धा इत्यादी सब पर विश्वास नहीं रखते है।
लेकिन ये नास्तिक लोग समाज के डर से यह सच या उनकी समझ खुलकर नहीं बोल पाते। ये लोग बिंदास होकर नहीं बोल पाते की वो नास्तिक है। और उनका डर भी वाजिब है, क्यूँकी जो आस्तिक लोग है, वो नास्तिक लोगों के ऐसे विचार सुनकर अमूमन एकदम से हिंसक हो जाते हैं
और इसीलिए ये जो बहुत से नास्तिक लोग है, वो बाहर की दुनिया में व्यक्त होते है तब बोलते है, मानते है की ईश्वर का पता नहीं लेकिन कोई शक्ति, कोई ताकत है जो हम सभी को "कंट्रोल" कर रही है, जिसने हम सभी को, ब्रम्हांड को बनाया है।
ऐसा बोलकर ये "नास्तिक" लोग असल में "आस्तिकों की हिंसक भीड" से खुद का बचाव करते है, खुदको सुरक्षित करते है।
●इस सबका सार यह निकलता है की.......
आस्तिकता काल्पनिकता है, जो वास्तविकता को बिल्कुल महत्व नहीं देती और काल्पनिकता को ही बिना चुनौति अंतिम शक्ति या अंतिम सत्य मानती है।
और...
नास्तिकता शास्त्रीय, तार्किक पैमानों पर वास्तविकता को समझने की निरंतर कोशिश है, जो चुनौतियों का हमेशा स्वागत करती है।
- - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - -
● किसे आस्तिक बनना है और किसे नास्तिक.....??
अब इस वास्तविक दुनिया में किसे काल्पनिकता से जीवन बिताना है और किसे वास्तविकता से, यह हर किसी का व्यक्तिगत फैसला है।
लेकिन इस विषय पर व्यक्तिगत फैसले कुछ भी हो, दुनिया और समाज को बेहतर बनाने के लिए दोनों तरफ के विचारों का प्रकट होना, बिना गाली-गलौज किए विचारों का आदान-प्रदान होना, यह प्रकिया बहुत जरूरी है। तो इस प्रक्रिया का हिस्सा बनिये और इसे बरकरार रखिये।
Cpd....🙏
◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆
Comments
Post a Comment