कद की ही तो बात है

 कद की ही तो बात है : 

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वर्तमान राजा पूर्व राजा की मूर्ति के सामने खड़ा है। उसका कद मूर्ति के अंगूठे से भी कम है। आसमान छूती हुई मूर्ति के सामने वो खुद को चींटी सा महसूस कर रहा था। राजा की इच्छा थी कि इस मूर्ति से बड़ी मूर्ति लगाई जाए उसकी भविष्य में।

तभी उसके कानों में फुसफुसाने की आवाज़ आई तो उसने देखा कि ये तो पूर्व राजा बोल रहा – "तुम मुझे श्रद्धांजलि देने आए हो ना।"

राजा ने अनमने ढंग से जवाब दिया – हाँ 

"तो औपचारिकता क्यों निभा रहे हो....? दिल से दो भई ।"

राजा मौन था। 

" शायद तुम ये चाहते हो ना कि तुम्हारी भी मूर्ति लगे मेरे बगल में और मुझसे भी बड़ी हो ?"

राजा कुनामुनाया और हां में धीरे से सर हिलाया।

" अब ये बताओ कि क्यों लगनी चाहिए तुम्हारी मूर्ति ? इसलिए की तुम राजा हो। मुझसे थोड़े दिन ज्यादा शासन कर लिया, क्या इसलिए ? ?"

 वर्तमान राजा के चेहरे पर थोड़ा सा घमंड झलका।

मूर्ति के चेहरे पर मुस्कान आई। "जनता के सामने तो तुम बहुत बोलते हो। मेरी, मेरे खानदान, मेरे वंशजों की बहुत बुराई करते हो। फ़िर मेरे सामने क्यों सर झुकाते हो?"

"यही तो राजनीति है।" राजा ने हिम्मत कर के जवाब दिया।

फिर मूर्ति बोली - "मैंने इतने राज्यों को जीता। सब को एक ध्वज के नीचे सजाया। चक्रवर्ती सम्राट बना। प्रजा का सच्चा साथी बना। हर हाथ को काम हर सर को छत दिया, तब इस मूर्ति, इस सम्मान का हकदार बना। 

तुमने क्या किया है, जो ऐसी प्रतिष्ठा मिले। तुमने तो राज्य को धर्म, जाति, अमीर, गरीब में बांट दिया है। जितने राज्य मैंने जीते वो अब अलग राज्य मांग रहे हैं। तुम इतिहास में बुरे राजा के रूप में याद किए जाओगे।"

राजा ने गला खंखार कर जवाब दिया– "आप गलत सोच रहे हैं। आपके समय में सब मिलकर रहते थे। अब सबको अलग अपना राज्य चाहिए। मैं उनकी भावना का सम्मान कर रहा हूँ। सब को अलग अलग राज्य बनाकर दूंगा, जिससे वो बंट जाएंगे। फ़िर मैं सेना की शक्ति से सबको जीत लूंगा। वो अलग भी रहेंगे लेकिन मेरे कंट्रोल में भी। यह कहते हुए राजा ज़ोर से हँस दिया। "

 तभी मूर्ति में कंपन हुई और उसका अंगूठा हिला और राजा उसके नीचे दब गया। मूर्ति ने गुस्से में कहा– "मैंने, मेरे पूर्वजों, मेरे वंशजों ने जिस परम्परा को सम्हाल कर रखा, बढ़ाया, विश्व में सम्मान दिलाया। तुम उसे मटियामेट कर रहे हो और चाहते हो मुझसे बड़े राजा बन जाओ। कितना भी झूठ फैला लो, कितनी भी कहानियाँ लिख दो। सब सच जानते हैं। तुम कभी मुझ जैसे नहीं बन पाओगे। और मूर्ति ने राजा को अंगूठे से मसल दिया।"

राजा चौंककर उठा। सुबह का वक्त था। सूरज आसमां में निकलने वाला था। उसका शरीर पसीने से तरबतर था। 

उसने आवाज़ लगाई। 

दरबान आया। राजा ने कहा –"प्रधान मंत्री को सूचित करो कि आज हमारी तबियत खराब है आज के सारे कार्यक्रम निरस्त किए जाएं।"

मुंहलगे दरबान ने पूछा –"महाराज आज तो बड़े राजा की जयंती है ऐसे में आप का न जाना?"

"जिन्दा रहूंगा तो ऐसी जयंती फ़िर मना लूंगा।" राजा बड़बड़ाया। उसने हाथ से जाने का इशारा किया और रजाई में घुस गया।

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