परिंदा बनो और उडो़

परिंदा बनो और उडो़ : 

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खुद को परिंदा बनने दो और रुको नहीं

और ऊँचे चले जाओगे क्योंकि उड़ान बाकी है

तुमने ये जाना ही नहीं कि तुम्हारे पंखों

और हौसलों में मंजिल पाने की जान बाकी है

निराशा और फ़िकर को कभी खुद पर 

हावी नहीं होने देना ये हमें कमज़ोर बनाती हैं

जो उम्मीदें बरकरार रखोगे तभी जानोगे 

दुनिया जीत लेंगे गर दिल में अरमान बाकी है

कहने को साथ बहुत से लोग दिखेंगे पर

हर साथ लंबी दूरी तक साथ दे ये जरूरी नहीं

अपना वही जो मुश्किलों में संग हो जहां

आपसी फ़िक्र और लगाव दरमियान बाकी है

किसी सहारे की जरूरत नहीं है तुम्हें

तुम खुद इतने काबिल हो कि ऊँचे उड़ सको

विस्तार की कोई सीमा नहीं हुआ करती

बस पंख खोलकर देखो पूरा आसमान बाकी है।

             ~ जया सिंह ~

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