वही पुराने दिन

वही पुराने दिन : 

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चलो फ़िर से पीछे लौटते हैं

वही बस्ता, वही स्कूल वही टिफ़िन की

दुनिया में बचपन खोजते हैं

छोटू सा वीडियो गेम जो पापा लाये थे

जिसको खेलते हुए हमने ढेरों

न भूलने वाली खुशियों के पल कमाए थे

वो दुपहिया स्कूटर जो पूरे घर की

सवारी हुआ करता था, जिसपर बैठकर

तब हमारा गुरूर सजता था

ब्लैक एंड व्हाइट टीवी भी कितना प्यारा था

जिस पर रामायण, हम लोग

जैसे धारावाहिक को पूरे परिवार के साथ

बैठकर बड़े मजे से निहारा था

हर बुधवार की शाम बिनाका गीतमाला के 

नाम हुआ करती थी जहां

अमीन सयानी की मधुर के आवाज़ सजती थी

बस एक ही लोहे की अलमारी 

सभी के तमाम कपड़े समा कर रख लेती थी

ना जाने कैसे माँ घर की तमाम 

ज़रूरियात छोटी सी कमाई से ढक लेती थी

लाइट जाने पर मोमबत्ती ढूंढना

और लालटेन में तेल भरा है कि नहीं ये पूछना

दो डिब्बों को रस्सी से जोड़कर

अपने दोस्तों संग खुद का टेलीफोन बनाना

फिर दो कोनों में जाकर एक दूजे से

बातें करना और खेल की खुशी में खो जाना

नहीं थी बहुत बड़ी बड़ी सहूलियतें

फ़िर भी जिंदगी सन्तुष्ट थी जुड़ाव भरपूर था 

सादी सरल सी ख्वाहिशें थी और

लालसा लालच से भरा मन कोसो दूर था।

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