जरूरी और गैरजरूरी
ज़रूरी और गैरजरूरी :
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जिंदगी में जब भी मुड़ कर देखना
तो ये जानने की कोशिश करना कि
जो गलत हुआ वो कितना जरूरी था
क्या उसके होने को टालना हाथ में था
या उसको होने देना कहीं मंशा में था
या फिर महज नियति की मजबूरी था
ज़िन्दगी को एक ढर्रे पर जीते रहना
या लम्हों पर नियंत्रण क्या गैरजरूरी था
वक्त की पाबंदियां भी जरूरी होती है
पर सवाल फिर से वही सामने है कि
क्या जो हुआ उसका होना जरूरी था
क्योंकि बदलाव तो प्रकृति का नियम है
और जरूरी नहीं कि बदलाव मनमाफ़िक हों
शायद इसीलिए जो गलत लग रहा है
वह शायद नियति की नज़रों में सही था
हमारी उसको टालने की कोशिश भी
उसको टाल नहीं सकती क्योंकि
उसका होना ही ज़िन्दगी के चलते रहने का
द्योतक था, जिंदा होने का सबूत था।
~ जया सिंह ~
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