जिव्हा एक : अहसास अनेक
जीभ
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जीभ इतनी चटखरी
कि स्वाद में डूबे तो
डूबती ही जाए
बातों में
डूबे तो
डूबती ही जाए
और जब
अपने ही
दांतों से कट जाती
तब अपनी ही
अनदेखी नज़दीकियों पर
मन मारकर रह जाती ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह ----- " आंगन बुहारते वक्त " से उद्धृत )
जीभ का सबसे महत्वपूर्ण काम है स्वाद लेना ,बातें करना ,शब्दों और ध्वनियों का उच्चारन करना । जीभ सम्पर्क बनाने के लिए भी इस्तेमाल होती है । जीभ मनोविकारों और मनोरंजन, हास -परिहास, उपहास , मजाक ,आलोचना, बतकही, चुगली, कानाफूसी सब में चटखारा पैदा कर देती है । यह स्वाद है वस्तुओं का स्वाद है मिठाइयों का ,फलों का , षटरस का , छप्पन भोग के रसायनों का ,मसालों का , मीठा ,तीखा, चटपटा सब का स्वाद जीभ ही मस्तिष्क तक पहुंचाती है । यही तो आदमी के भोग का , आनंद का , प्रसन्नता का सबसे बड़ा जरिया है ।जीभ न हो तो। प्राणीमात्र संसार के सभी पदार्थों का स्वाद ही न चख पाए । न रस भरी बातों का रस ही ले पाए । जीभ ही वह रस पैदा करने वाला साधन है जिसके जरिए फलों का, अन्न का, षटरस पदार्थों का मजा ले पाता है । स्वाद तो मीठा है ,तीखा है , नमकीन है , चरपरा है , तूरा है , स्वाद में बेस्वाद है कड़ुवा है, खट्टा है , विषैला है । यह सब जीभ के भोग का स्वाद है । जब जीभ स्वाद के रस में डूबती है तब उसे स्वाद की अति का ध्यान नहीं रहता । स्वाद भी एक नशा, एक मद, एक आनंद का ऐसा व्यूह रचता है कि प्राणी चाहकर भी उससे दूर नहीं जा पाता ,उससे मुक्त नही हो पाता , उसे छोड़ नहीं पाता भले ही रोग ग्रस्त हो जाए । चाहे बर्बाद हो जाए । चाहे धन - सम्पति बिक जाए, घर - परिवार बिखर जाए , समाज में इज्जत खत्म हो जाए , लेकिन मुंह से लगी किसी भी वस्तु को छोड़ पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होता है ।यह स्वाद ही का जोर होता है कि आदमी इसमें डूबता ही जाता है । यह डूबना ही तो नाश का ,विनाश का कारण बन जाता है ।यह डूबना मामूली नहीं होता । जीभ के स्वाद में डूबना ही सर्वनाश का हेतु भी हो सकता है । जीभ से जुड़ा हुआ एक स्वाद और है बातों का स्वाद ।बात बात में बात ज्यों केले के पात पात में पात ।यह है सज्जन की बातों का स्वाद । बातों में से बातों का निकलना ,संदर्भ और प्रसंग का जुड़ते जाना , घटनाओं के विवरण, अनुभव , और अनुभूति से जुड़ी हुई चर्चा । यह सब होता है सज्जन की बातों में , साधु - संतों के दुनिया जहान की बातों में , बातों में ही जुड़ती जाती है अनुभव की बातें , हादसे और घटनाओं की बातें , कुछ आप बीती और कुछ परबीती भी होती है बातों में । यह लोक का अनुभव ही तो होता है जो यहां - वहां से चला आता है। समाज की परिपक्वता के लिए । बातों में ही निहित होता है लोकरस , लोक वैविध्य, लोक रंग, लोक व्यवहार और लोक चलन । प्रसिद्ध व्यंग्य लेखक श्री हरिशंकर परसाई सबसे महत्वपूर्ण रस मानते हैं नौ रसों में सर्वोपरि और सर्व लोक प्रिय रस निन्दा रस । एक बार आदमी यदि इस रस में डूबे गया तो उसे न तो जरुरी काम याद रहेंगे न समय याद रहेगा ,समय व्यतीत करने का सबसे बड़ा साधन है निन्दा करना ।आदमी को किसी के गुण याद रहे ना रहे लेकिन दुर्गुण जरुरी याद रहते हैं , कमियां जरुर याद रहती हैं ,तारीफ आदमी करें या न करे लेकिन आलोचना करना कभी नहीं भूलता । स्वभाव की , प्रकृति की बारीकियों के दुर्गुण जरुरी खोज लाना आदमी की सबसे बड़ी खासियत होती है । यही तो है निन्दा रस और इसमें मसाला - मिर्ची डालने का काम जीभ ही तो करती है । लेकिन इस कमियां , दुर्गुण करती जीभ के दायरे में जब अपना ही कोई आत्मीय आ जाता है तो फिर जीभ उसकी निन्दा नहीं करती ,उसकी कमियों को ,दुर्गुणों को अनदेखा करती है । फिर जीभ अपने आप कटने लगती है ।कुछ भी कह नहीं सकती यही तो है जीभ का स्वाद और बचाव के तरीके । यही है स्वाद के वैविध्य और चटखारे ।स्वाद के लिए जब अपना ही कोई आत्मीय जीभ के भीतर स्वाद के लिए आ जाता है तो जीभ फिर कतरनें से रुक जाती है । जीभ को अपना मन मारना पड़ता है ।याने जीभ ही है लोक व्यवहार निभाती और दूर और पास के रिश्ते निबाहती , भेद करती , अपना - पराया समझाती । जीभ की माया अपरम्पार है । जीभ सबके राज खोलती भी है और उगल भी देती है सारे राज छुपा भी लेती है । जीभ के स्वाद बदलते रहते हैं। कभी पदार्थ और कभी व्यक्ति, कभी व्यवस्था और कभी समाज , कभी राजनीति ,कभी अर्थव्यवस्था ,कभी धर्म, कभी अध्यात्म ,कभी फैशन ,कभी मर्यादा , कभी छिछोरापन कभी संकीर्णता, कभी उन्मुक्तता ,कभ शर्म,हया कभी बेशर्मी , उच्छृंखल आचरण , कभी नीति और कभी अनीति ,मूल्यहीनता , भ्रष्टाचार , मिथ्या और चेतना के पतन पर रोष ? क्या नहीं है जिव्हा के स्वाद में ? रहीम ने इसीलिए कहा-- रहिमन जिव्हा बावरी ,कह गई सरग - पताल ,आप तो कह भीतर गई , जूती खाय कपार ।।
यह है जीभ की चहक, जीभ की उन्मुक्त स्थिति , जीभ को पदार्थ का सेवन करते समय और लाचारता पर सदैव संयम रखना चाहिए ।उसे स्वाद में इतना नहीं डूबना चाहिए की गैर और अपने के बीच फर्क ही ना कर सके ।जीभ का आपे में रहना ही बेहतर है । यह भी सोचना विचारना चाहिए कि क्यों और क्या कहा जा रहा है । मुंहफट होना ठीक है लेकिन शाब्दिक संयम उससे भी बहुत जरुरी है । बातों में संयम होना सज्जनता और सभ्यता की निशानी है । वाणी ही संस्कार को प्रकट करने का सबसे बड़ा साधन और माध्यम है । सम्पन्नता ,धन- दौलत,अमीरी - गरीबी संस्कार और शिक्षा नहीं है वरन वाणी का बेहतर प्रयोग ही सबसे बड़ा संस्कार है । शब्द भी जहरीले होते हैं । संस्कार हीन होते हैं ।
Cpd ◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆
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