शर्मनाक रवैया

 शर्मनाक रवैया:

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पिछला ब्लॉग क्रिसमस पर हुई तोड़फोड़ और हिंसा के जिक्र पर लिखा गया। पर इस तरह की खबरें निरंतर आ रही जो शर्मनाक है। अभी हाल ही में वाराणसी के घाट पर जापानी टूरिस्ट के साथ बदसलूकी की गई जो सांता की टोपी लगाकर घाट पर घूम रहे थे। लोगों को आखिर हो क्या गया है जिसमें कोई भी धर्म अपनी स्वायत्तता से धर्मिक उत्सव या आयोजन नहीं कर सकता। 

खुशी मनाने के लिए बस मौके मिलने चाहिए। क्या उस के लिए बस अपने ही आयोजनों पर निर्भर रहना चाहिए। एक छोटी सी बात समझें...दूसरों के घर विवाह जन्मदिन या कोई अन्य सामाजिक कार्यक्रम में हम भी शामिल होते हैं। वो हमारे खुद के घर का तो होता नहीं। पर चूंकि वह एक खुशी का मौका है और खुशी बांटने से बढ़ती है इसलिए किसी एक घर के सामाजिक कार्यक्रम में बहुत से लोगों को न्यौता दिया जाता है हम सब जातें है। मज़े करते हैं नाचते गाते है। अच्छा खाते पीते है। यही तो सब जिंदगी में बदलाव के लिए अच्छा लगता है। 

इसी तरह लोगों के सलग अलग धर्मिक कार्यक्रम भी होता हैं। त्यौहार, उत्सव और मान्यताएँ... वो सब उनके अनुसार मनाई जाती है। होली पर रंग, दिवाली पर रोशनी, नवरात्रि में देवी आराधना , ईद पर सेवइयां, लोहड़ी पर तिल रेवड़ी ग़जक, गुरुपर्व पर लंगर, क्रिसमस पर केक सांता क्लॉज़ वगैरह.... ये सब विविधता है। और इसी विविधता में जिंदगी के रंग भरे हुए हैं। 

अगर सिर्फ अपनी ही खुशियों तक सिमट कर रह गए तो मौके तलाशने होंगे। क्योंकि जीवन व्यवस्तताओ से भरा हुआ है। किस के पास इतना समय है कि रोज रोज सेलिब्रेशन के लिए तैयार रहे। ऐसे में वह बाकी जरूरतों के लिए समय कैसे निकालेग ..? ? 

ऐसे मरण हमें अपने आसपास दूसरी जगहों, लोगों और धर्मों में मौके ढूंढने पड़ेंगे। जिससे हम खुश रह सके। enjoy कर सके। शर्म है उन लोगों पर जो इस तरह तोड़फोड़ करके हिंदुस्तान की छवि को ठेस पहुंचा रहे है । उनके लिए शायद ये एक time pass घटना हो सकती है। पर देश के लिए ये शर्मनाक घटना है। 

वर्तमान सत्ता ने लोगों के मन में ये जो जहर भर दिया है। कल ये आग हमारे खुद तक ज़रूर पहुंचेगी। क्योंकि आग बस लगने की देती जोती है उसका फैलना निश्चित है।

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