धर्म : जरूरी या गैरजरूरी
धर्म : ज़रूरी या गैरजरूरी
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अभी हाल ही में एक सोशल मीडिया डिबेट में जावेद अख्तर साहेब और एक मुस्लिम स्कॉलर मुफ़्ती शमिल नदवी के बीच ईश्वर या अल्लाह के होने या ना होने को लेकर एक सार्थक बहस हुई। कोई चिल्लम चिल्लाहट नहीं। दोनों ने अपने अपने तर्क बड़े ही सुकूँ और सलीके से रखे। जावेद साहेब खुद को नास्तिक मानते हैं। जबकि मुफ़्ती जी अपने तर्कों से अल्लाह के होने की दलील दे रहे थे।
इसमें कोई शक नहीं कि जावेद अख्तर एक पढ़े लिखे और बेहद सुलझे हुए समझदार आदमी हैं। उनके जितना ज्ञान बहुत कम लोग हासिल कर पाते हैं। वो एक स्वघोषित नास्तिक भी हैं। पिछले कुछ अरसे से उनके इंटरव्यू के बहुत से हिस्से लोगों ने काट छांट कर वायरल कर दिए जिससे उनकी बातें हर किसी तक पहुंच गई। अब हर आदमी जो सोशल मीडिया पर रील देख रहा है उसके पास जावेद अख्तर की कोई रील ज़रूर आती है। जावेद साहब खुद भी इस बात से बखूबी वाकिफ होंगे कि कुछ लोग उन्हें पसंद करते हैं और कुछ नापसंद । लेकिन फिर भी वो अपनी बात उतनी ही मज़बूती से रखते हैं। क्योंकि वो जानते हैं कि उनके तर्कों और अभिव्यक्ति में दम है।
दरअसल उनकी स्पीच लोगों को दो धड़ों में बांटती है। एक वो जो उनके तर्कों को तवज्जो देते हैं दूसरे वो जो उन्हें नफ़रत की नजर से देखते हैं। ऐसा लगता है कि वो अपनी बातों से दलीलों से लोगों से उनका धर्म छीनने पर तुले हुए हैं। अपनी नास्तिकता को साबित करते हुए वो इतने आगे चले गए कि लोगों को लगने लगा कि वो उनकी आस्था को हल्के में लेने लगे हैं। हालांकि आस्था के खिलाफ़ बोलना बेहद जोख़िम भरा काम है हमारे देश में। जान का खतरा भी मोल लेना होता है।
अब सवाल बस इतना है कि जावेद साहब लोगों से उनका धर्म छीनकर बदले में उन्हें क्या देना चाहते हैं और उनका जवाब है कॉमन सेंस। लेकिन अगर लोगों को कॉमन सेंस की ज़रूरत ही न हो तो ? आप कहेंगे वो लोग मूर्ख हैं या डरे हुए हैं। लेकिन ऐसा नहीं है। धर्म इंसान को अगर डराता भी है तो दूसरी तरफ उसके अस्तित्व की रक्षा भी करता है। सिर्फ़ डरे हुए लोग ही धार्मिक नहीं होते हैं बल्कि बहुत सारे पढ़े लिखे समझदार लोग बेहद धार्मिक प्रवृत्ति के होते हैं। इसलिए नहीं कि वे डरते हैं बल्कि इसलिए कि यह विश्वास कहीं ना कहीं ये उनके जीवन को अर्थपूर्ण बनाता है कि उनके जन्म से लेकर मरने तक कहीं न कहीं किसी शक्ति का हाथ है और ये शक्ति निसंदेह ईश्वर है। आप मुस्लिम्स का उदाहरण ले सकते हैं। इस्लाम के मानने वालों की सबसे बुनियादी ड्यूटी है नमाज़ जो किसी भी मुसलमान पर हर हाल में फ़र्ज़ है। आप अमीर हैं या ग़रीब, जवान हैं या बूढ़े, काले हैं या गोरे। मरने के बाद जब आपका हिसाब होगा तो सबसे पहले नमाज़ के बारे में सवाल किया जाएगा। नमाज़ नहीं तो जन्नत में जाने के इम्कान लगभग ज़ीरो फीसद रह जाते हैं। हर मुसलमान ये बात अच्छी तरह जानता है फिर भी नमाज़ पढ़ने वालों की संख्या कितनी है दो चार या पांच फीसदी। तो बाकी के 95 परसेंट लोग जो ये जानते हैं कि वे जहन्नुम में जाएंगे वे अभी तक धर्म से जुड़े हुए क्यों हैं? इसका जवाब वहीं है कि वे स्वर्ग या नर्क को लेकर गंभीर नहीं हैं वे बस अपना ये विश्वास नहीं छोड़ सकते कि वो किसी अदृश्य शक्ति की बदौलत जीवित हैं। आखिर अपने अस्तित्व की हिफाज़त के लिए लोग धर्म से जुड़े रहते हैं।
जावेद साहब का अपना पक्ष ये है वे इस विश्वास के बिना अच्छे से जी पा रहे हैं। लेकिन करोड़ों लोग इसके बिना जीने के लिए तैयार नहीं हैं। लेकिन अगर गहराई में जाकर सोचा जाए तो जावेद साहेब की कही बहुत सी बातों का अर्थ समझ आएगा। धर्म एक बंधन है। जिसने बंधकर हम आश्रित होने लगते है कुछ नियमों के, कुछ संस्कारों के, कुछ रीतियों के, कुछ रिवाजों के वग़ैरह वग़ैरह। जबकि धर्म से आज़ाद होकर हम मन में कोई भी भ्रांति रखे बिना कुछ भी सोच और कर सकते है। जो लोग धर्म को पक्का मानते हैं क्या वो कभी गलत कार्य करते समय ये सोचते हैं कि ये धर्मानुकूल नहीं है। क्या बलात्कार, हत्या, चोरी चकारी करते वक्त उनके मन में एक बार भी धर्म के आचरण की चिंता नहीं उभरती। यही जावेद साहेब कहते हैं कि बिना धर्मिक हुए भी अच्छा इंसान बना रहा जा सकता हैं। फ़िर भी धर्मों ने हमारे दिमाग़ में सदियों तक शासन किया है आज भी कर रहे हैं और तब तक करते रहेंगे जब तक मानव जीवन किसी नई परिभाषा की ईजाद नहीं कर लेता।
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