प्रेम की चाहत
प्रेम की चाहत :
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जब हम प्रेम चाहते थे और उसने मुझे पीड़ा दी
दुनिया में हर वस्तु खरीदने के लिए नहीं होती
और ना ही स्वामित्व के लिए ...
वह शायद भोग, भाव, प्रयोग एवं त्याग के लिए थी
इंसानों में सामान होकर भी कुछ भी समान नहीं होता
क्या बस यही एक कहानी का आधार हो सकता है...!
मेरे प्रिय! क्यों तुम्हें नहीं कह सकी कि
मेरे प्रिय तुम हो.... सिर्फ़ तुम
यही तो प्रेम की परकाष्ठा है शायद
तब आँखें बंजर होती है हृदय रोता है और जिह्वा निःशब्द
प्रेम यातना का सफर भले तय कर ले
मगर याचना का कभी ना करे...!!
जो छल में पारंगत होते हैं वो प्रेम का महत्व नहीं जानते
केवल अंगों से बना हुआ प्रेम नहीं होता
जब हृदय की खोज में निकलोगे तो दिमाग के ढेर मिलेंगे
वह मन की तहों को खोजता गया और संवाद करता गया
उसके साथ खिलखिलाता हुआ पुरुष ही प्रेम है
प्रेम में स्त्री का कल्पना में पुरुष हमेशा देह से आगे रहता है
स्त्री का प्रेम किसी भी युग में
हमेशा ही देह से आगे रहेगा,...
प्रेम में पीड़ा हो पर पीड़ा से प्रेम न हो
इंसानी भावनाओं को नकार कर
कोई भी कहानी नहीं लिखी जा सकती ये सत्य है
सबसे अच्छी कहानियाँ ईश्वर लिखता है
एक कहानी में तब्दील होता जा रहा
हृदय जब रोया तब जाना कि वो मर रहा था
'जीवन कैसा होना चाहिए ' का रहस्य लेकर अपने साथ
बुद्धी वालों के लिए हृदय बस एक अंग है
क्योंकि उसके खो जाने से पहले उसे किसी ने आवाज़ नहीं दी
यह कब समझ आता है कि किसे आवाज देनी चाहिए
और किसे जाने देना चाहिए।
जो छल में पारंगत हो वो प्रेम का महत्व नहीं जानते
समय से अधिक स्वतंत्र इस दुनिया में क्या है...?
बस वही तो है जो हर कहानी को उसके
अंजाम तक पहुंचाता भी है और सजाता बिगाड़ता भी है
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