एक नाले ने देखा बदलता जीवन
एक नाले ने देखा बदलता जीवन :
•••••••••••••••••••••••••••••••••
धनपाड़ा हरदा की तहसील रहट गांव का एक छोटा सा गांव है और वहीं ये सतपुड़ा अंचल को स्पर्श करके नाला बहता है । नाले के आसपास हरा-भरा जंगल है और जंगल में उगती वन उपज है । जो गोंद ,करौद, तेंदू ,महुआ, अचार ( चारोली ) के नाम से जानी जाती है । नाला अब मानव रुप धारण कर चुका है । वह केवल नाला नहीं रह गया। वरन नाले ने आदिवासी की रुपाकृति पा ली है । जंगल हरा-भरा है लेकिन जन वासी भूखा - सूखा है । पीठ से पेट चिपक चुका है । उसके सिर पर जंगल की बहुमूल्य उपज रखी हुई है फिर भी उसको उसका मूल्य नहीं पता है । वह औने - पौने भाव में अपनी कीमती उपज को बाजार में बेच जाता है और खुद गरीबी में जीवन निर्वाह करता है । बाजार मूल्य की उसे जानकारी ही नहीं है । उसकी वन सम्पदा पर दलाल और मुनाफा खोर व्यवसायी अपनी लाभ और लोभ के अनुमान से वन की उपज को खरीदते हैं और वनवासी लाभ से वंचित रहता है । इसलिए ही तो नाला अपने कई - कई रुपान्तरों में कविता में आता है । नाला वहां दिख रहा है जहां महुआ, सतकटा, और पलाश के ठूंठ भर हैं । चिन्ता उभर रही है नाले की स्मृति के साथ ठूंठ होता वन भी ख्यालों में आ रहा है । किस तरह वन का ,जंगल का दोहन हो रहा है । टाटा जन रहा है । प्राणियों से उनके फेफड़े छीने जा रहे हैं । जब जंगल ही नहीं रहेगा तब प्राणवायु कहां से आयेगी । नाले के साथ जंगल के अपने के दृश्य भी उभर रहे हैं । नाले के साथ जंगल की वे जड़ी - बूटियां भी याद आई जिनसे समाज अपनी सेहत सुधारता है । वन्य जीव जन्तुओं और पक्षियों में कुरुच, सारस, और बकुल आये लेकिन वे तब ही रहेंगे जब जंगल बचा रहेगा । नाले के आसपास जुगनुओं के वे समूह चमकते दिखे जो जंगल की ही धरोहर है । नाला अपनी ना ना छवियों में रुप धारण करता आया । नाला शावक सा फुदकता दिख रहा है जैसे वह बच्चा हो और सतपुड़ा उसका पूर्वज दादा हो उसकी अंगुली पकड़े इठलाता नन्हा बच्चा सा नाला ।ये नाला रुपी नन्हा बालक कृष्ण की भांति हुरंगा याने मोरपंख अपनी पगड़ी में खोंस कर आ रहा है नाला । अरे !नहीं नहीं ये तो वनवासी है नाला ।इसने जंगल की बहुत सारी उपज बीन बीन कर जो एकत्रित की है उसी को हाट - बाजार में बेचने आया है। अरे ! देखो - देखो ये कितना गरीब और कमजोर है ,इसकी पीठ पेट से जा चिपकी है । जंगल उजड़ रहा है ।नाला भी लंगोटी लगाये लेकिन दमक के साथ आया। ख्यालों में नाला आया ! नाला अपने साथ जंगल के सभी दृश्य साकार कर रहा है ।यह नाला अकेला सतपुड़ा अंचल का ही नहीं वरन यह तो सारे हिन्दुस्तान के नालों की दास्तान है । नाला जहां जहां भी है उसके आसपास के जंगलों को इसी तरह नष्ट किया जा रहा है । नाला लंगोटी लगाये जंगल का रक्षक बना हुआ है वह उसके स्वामी होने का अनुभव नहीं करता । इसीलिए वह निरंतर मेहनत करते हुए भी निर्धन और असहाय ही है । नाला के भाव वैविध्य ने नाले को बहुत सी रुप छवियों में उपस्थित किया । यही धनपाड़े के नाले की विशिष्टता है ।
◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆
Comments
Post a Comment