सबकी सुन लेते है हम
सबकी सुन लेते हैं हम :
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सबकी सुन लेते है हम
अपनी अपने तक रखते हैं
शिकन छुपाकर चेहरे की
झूठी मुस्कान से सजते हैं
हमारा साथ सभी के लिए
पर हमारे साथ कोई नहीं
अकेलेपन की ये पीड़ा
बिन कुछ भी बोले सहते हैं
भारी भीड़ है इर्दगिर्द
पर अपना कोई एक नहीं
मदद का हाथ बढ़ाएं कैसे
ये सोच सकुचाये रहते हैं
मतलबी लोग, स्वार्थी सोच
बस यही आज की दुनिया है
एक हम ही कैसे बेहूदे से
बेमतलबी बन कर फिरते हैं
इस्तेमाल होना आदत बन गई
इसलिए मौके पर हाज़िर होते है
हमारी ज़रूरत पर हर कोई
व्यस्त होने के वजहें कहते हैं !
~ जया सिंह ~
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