वक्त की स्वीकारोक्ति

 वक्त की स्वीकारोक्ति 

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हम तुम बस एक माध्यम है ,

जो होगा वह सब निहित है।

मन क्यों दुखी करके रोएं ,

जीवन की सब राहें चिंहित हैं।


इस आर पार की जद्दोज़हद ,

में रोज डूबते व उभरते हैं।

फिर भी वक्त के मुताबिक ,

हम कभी भी नहीं सवरतें हैं।


स्वीकार लिया जो सच को,

मन हल्का, ठहरा हो जाये

अंतर्मन की हलचल में ,

शांति का पहरा हो जाये ।


जो हो रहा है वो रेखाओं में,

भाग्य बनकर लिखा है।

उसकी रज़ा शामिल है हर शै में,

ये यकीं हर पल दिखा है।


बेवज़ह ही हम चिंता करते हैं,

उसने थामी हुई है हमारी डोर।

घने अंधियारों में से छानकर,

वही दिखायेगा उजली भोर।

          ~ जया सिंह ~

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